RSS प्रमुख मोहन भागवत ने नागौर में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में केवल सफलता हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक सार्थक और समाज के प्रति समर्पित इंसान बनना अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला।

  • सफल होने से अधिक महत्वपूर्ण एक 'सार्थक' इंसान बनना है।
  • शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि सही-गलत का भेद समझना होना चाहिए।
  • समाज की विजय 'असुर विजय' नहीं, बल्कि 'धर्म विजय' होनी चाहिए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने राजस्थान के नागौर जिले के गोटन में एक निजी शिक्षण संस्थान के वार्षिक समारोह में शिरकत की। इस अवसर पर उन्होंने युवाओं और छात्रों को जीवन के गहरे दर्शन और शिक्षा के वास्तविक अर्थ के बारे में विस्तार से समझाया।

अपने संबोधन के दौरान भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान युग में प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि लोग केवल व्यक्तिगत सफलता की दौड़ में लगे हैं। उन्होंने कहा, "हमारे विद्यार्थी निश्चित रूप से सफल बनेंगे, लेकिन केवल सफल होने से ज्यादा महत्वपूर्ण सार्थक बनना है।" उनके अनुसार, एक सार्थक व्यक्ति वह है जो अपने व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए कार्य करता है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि भागवत का यह संदेश आज की उपभोक्तावादी संस्कृति और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षा प्रणाली के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक संतुलन बनाने का प्रयास है। यह समाज को भौतिकवाद से हटाकर नैतिक मूल्यों की ओर मोड़ने का संकेत है।

जीत केवल व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि के लिए नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना के लिए होनी चाहिए।

भागवत ने 'विजय' की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि समाज को प्रगति और जीत की आकांक्षा रखनी चाहिए, लेकिन यह जीत 'असुर विजय' (अधर्म के माध्यम से जीत) नहीं, बल्कि 'धर्म विजय' (सत्य और नैतिकता के माध्यम से जीत) होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सार्थक जीवन जीने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति महत्वाकांक्षाएं छोड़ दे, बल्कि यह है कि उसकी महत्वाकांक्षाएं समाज के हित में हों।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य

शिक्षा के महत्व पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को ईश्वर जैसा या शैतान जैसा बनने की स्वतंत्रता दी गई है, और सही चुनाव करने में शिक्षा ही सबसे बड़ी मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा, "शिक्षा सिर्फ रोजी-रोटी कमाने का साधन नहीं होनी चाहिए।" शिक्षा का वास्तविक कार्य व्यक्ति के भीतर विवेक पैदा करना है ताकि वह सही और गलत के बीच अंतर कर सके।

Did You Know?: आरएसएस (RSS) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना था।

Frequently Asked Questions

1. मोहन भागवत के अनुसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है?
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना या आजीविका कमाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को सही और गलत के बीच अंतर समझने और एक सार्थक जीवन जीने में सक्षम बनाना है।

2. 'असुर विजय' और 'धर्म विजय' में क्या अंतर है?
'असुर विजय' स्वार्थ और अधर्म के मार्ग से प्राप्त की गई जीत है, जबकि 'धर्म विजय' नैतिकता, सत्य और समाज के कल्याण के मार्ग से प्राप्त की गई जीत है।