केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि वि-औपनिवेशीकरण का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि उसे भारतीय नजरिए से दुनिया के सामने लाना है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने पर जोर दिया।

  • वि-औपनिवेशीकरण का उद्देश्य इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में सत्य प्रस्तुत करना है।
  • औपनिवेशिक व्याख्याओं ने भारतीयों में हीन भावना पैदा की है, जिसे दूर करना आवश्यक है।
  • ज्ञान और शक्ति के औपनिवेशिक गठजोड़ को तोड़कर भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित किया जाएगा।
  • असिआटिक सोसाइटी जैसे संस्थानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से वैश्विक पहुंच बनानी चाहिए।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने रविवार को मुंबई में 'असिआटिक सोसाइटी' में एक पांडुलिपि प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए देश के इतिहास और ज्ञान के वि-औपनिवेशीकरण (Decolonisation) पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वि-औपनिवेशीकरण का अर्थ अतीत को मिटाना नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक सत्य को एक प्रामाणिक और भारतीय दृष्टिकोण से दुनिया के सामने पेश करना है।

शाह ने कहा कि लंबे समय तक भारतीय ज्ञान, इतिहास, परंपराओं और भाषाओं की व्याख्या औपनिवेशिक चश्मे से की गई है। इस दृष्टिकोण ने न केवल तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, बल्कि भारतीयों के मन में एक हीन भावना (Inferiority Complex) भी पैदा की। उन्होंने तर्क दिया कि ब्रिटिश शासन के दौरान ज्ञान का उपयोग शक्ति के विस्तार के लिए किया गया था, और अब हमारा लक्ष्य ज्ञान को उस औपनिवेशिक ढांचे से मुक्त करना है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए उसके ज्ञान तंत्र को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करना अनिवार्य है। अमित शाह ने जोर देकर कहा कि जो राष्ट्र अपनी स्मृति, इतिहास, परंपराओं और भाषाओं की रक्षा नहीं कर सकता, वह लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। उन्होंने उदाहरण दिया कि भले ही हमलावरों ने नालंदा विश्वविद्यालय जैसे पुस्तकालयों को जला दिया हो, लेकिन वे उस ज्ञान को नष्ट नहीं कर सके जो लोगों की स्मृति और मौखिक परंपराओं में समाहित था।

वि-औपनिवेशीकरण का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि उसे भारत की अपनी आवाज में दुनिया को सुनाना है।

अमित शाह ने असिआटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान भारतीय अनुसंधान और ज्ञान के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने संस्था के नए निर्वाचित समिति, जिसका नेतृत्व भाजपा नेता विनय सहस्रबुद्धे कर रहे हैं, से आग्रह किया कि वे समाज के विशाल संग्रह तक पहुंच का विस्तार करें। उन्होंने पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और उन्हें देश भर के पुस्तकालयों के साथ साझा करने का प्रस्ताव भी रखा।

ऐतिहासिक संदर्भ: औपनिवेशिक प्रभाव बनाम भारतीय ज्ञान

ऐतिहासिक रूप से, भारत में 'इंडोलॉजी' (Indology) जैसे विषयों के माध्यम से भारतीय समाज का अध्ययन औपनिवेशिक हितों को ध्यान में रखकर किया गया था। इसका उद्देश्य विश्व कल्याण नहीं, बल्कि भारतीय प्रणालियों को समझना और शासन को सुगम बनाना था। शाह ने सुझाव दिया कि महाराष्ट्र के गांवों में घरों में रखी प्राचीन पांडुलिपियों को 'ज्ञान भारतम नेशनल मैनुस्क्रिप्ट मिशन' के तहत लाया जाना चाहिए ताकि उनके शोध से देश की आर्थिक और रणनीतिक प्रगति हो सके।

Did You Know?: नालंदा विश्वविद्यालय के विध्वंस के बावजूद, भारतीय दर्शन और व्याकरण का ज्ञान मौखिक परंपराओं के माध्यम से जीवित रहा और आज भी हमारे सांस्कृतिक ताने-बाने का हिस्सा है।

Frequently Asked Questions

1. अमित शाह के अनुसार वि-औपनिवेशीकरण का वास्तविक अर्थ क्या है?
इसका अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टिकोण और प्रामाणिक तथ्यों के साथ इतिहास को प्रस्तुत करना है।

2. असिआटिक सोसाइटी का महत्व क्या है?
यह 1804 में स्थापित एक प्राचीन संस्थान है जो एशिया और विशेष रूप से भारत के भाषा, दर्शन, कला और विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।