गोल्डमैन सैक्स ने अपनी मौद्रिक नीति की भविष्यवाणी को उलटते हुए कहा है कि फेडरल रिज़र्व सितंबर में 25 बेसिस पॉइंट की दर वृद्धि करेगा। यह बदलाव अमेरिकी मौद्रिक नीति के दिशा‑निर्देश में महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है।
- गोल्डमैन सैक्स ने फेड की सितंबर में दर वृद्धि की भविष्यवाणी की।
- वृद्धि 25 बेसिस पॉइंट (0.25%) होगी।
- यह अनुमान अमेरिकी आर्थिक नीति में नई दिशा दर्शाता है।
गोल्डमैन सैक्स ने अपनी पहले की राय को बदलते हुए बताया कि फेडरल रिज़र्व पहली बार कई वर्षों में सितंबर में ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की वृद्धि करेगा। यह बदलाव निवेशकों और नीति निर्माताओं के बीच व्यापक चर्चा का कारण बन गया है।
पहले, गोल्डमैन सैक्स ने कहा था कि फेड की दर वृद्धि के संकेत नहीं मिलेंगे, लेकिन हालिया आर्थिक डेटा, विशेषकर रोजगार और महंगाई के संकेतों ने इस दृष्टिकोण को बदल दिया है। कंपनी का कहना है कि महंगाई में अभी भी दबाव बना हुआ है, जिससे फेड को नीतिगत कड़ा कदम उठाना पड़ेगा।
फेडरल रिज़र्व के मौद्रिक नीति समिति (FOMC) ने अभी तक आधिकारिक रूप से इस वृद्धि की पुष्टि नहीं की है, परंतु कई बाजार विशेषज्ञों ने इस संभावना को पहले ही संकेतित कर दिया था। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे कम ब्याज दर बनाए रखने की वकालत की है, जिससे नीति में संभावित टकराव स्पष्ट हो रहा है।
Historical Background
पिछले दो दशकों में फेड ने कई बार दर वृद्धि की है, पर 2020 के कोविड‑19 संकट के बाद से दरें लगभग शून्य के निकट बनी रहीं। इस दौरान, फेड ने कई बार मौद्रिक सहजता को बढ़ाया, जिससे बाजार में तरलता बढ़ी। अब, महंगाई के संकेतों के कारण फेड को पुनः सख्ती अपनानी पड़ रही है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यदि फेड वास्तव में सितंबर में 0.25% की दर वृद्धि करता है, तो यह वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को बढ़ा सकता है, विशेषकर उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह में परिवर्तन लाएगा। यह कदम अमेरिकी डॉलर को सुदृढ़ कर सकता है और वस्तु मूल्यों पर दबाव बढ़ा सकता है।
"सितंबर में फेड की दर वृद्धि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार को संतुलित करने के लिए आवश्यक कदम है," प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. रवींद्र सिंह ने कहा।
Frequently Asked Questions
Q1: फेड की इस संभावित दर वृद्धि का भारतीय बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
A: उच्च अमेरिकी ब्याज दरें अक्सर विदेशी निवेश को अमेरिकी डॉलर की ओर मोड़ती हैं, जिससे भारतीय रुपये में दबाव बढ़ सकता है और इक्विटी बाजार में अस्थिरता आ सकती है।
Q2: क्या यह वृद्धि महंगाई को नियंत्रित करने में मदद करेगी?
A: संभावित रूप से हाँ; दर वृद्धि से उधार की लागत बढ़ती है, जिससे खर्च कम हो सकता है और महंगाई के दबाव में कमी आ सकती है।