पुणे के एक वकील परिवार ने परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम पेश किया है। वे कागज़ के पुनर्चक्रण से ऐसी गणेश मूर्तियाँ बनाते हैं जो पानी में पूरी तरह घुल जाती हैं।

  • पुणे का अग्रवाल परिवार पिछले 20 वर्षों से पर्यावरण के अनुकूल गणेश मूर्तियाँ बना रहा है।
  • वकील भाई और उनकी माँ कागज़ के पुनर्चक्रण (Recycle) से मूर्तियाँ तैयार करते हैं।
  • ये मूर्तियाँ प्राकृतिक रंगों और ऑर्गेनिक ग्लू से बनी हैं और 15 मिनट में पानी में घुल जाती हैं।

पुणे के प्रभात रोड पर स्थित एक छोटी सी कार्यशाला में, जहाँ आमतौर पर कानूनी फाइलों और अदालती मामलों की चर्चा होती है, वहां एक परिवार कुछ बेहद अलग कर रहा है। अग्रवाल परिवार, जिसमें वकील भाई और उनकी माँ शामिल हैं, महीनों तक कड़ी मेहनत करके कागज़ के मेशे (Paper Mache) से गणेश की मूर्तियाँ तैयार करते हैं। ये मूर्तियाँ न केवल कलात्मक हैं, बल्कि पर्यावरण के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता का प्रतीक भी हैं।

सुरेखा अग्रवाल (54) और उनके दो बेटे, आशीष (36) और आदेश (31), जो पेशे से वकील हैं, साल 2004 से इस मिशन में लगे हुए हैं। उनके साथ उनके पति प्रमोद अग्रवाल और उनकी 78 वर्षीय माँ विजया गाडे भी इस पुनीत कार्य में योगदान देते हैं। यह पहल उनके गुरु के मार्गदर्शन में शुरू हुई थी, जिन्होंने प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) के हानिकारक प्रभावों के खिलाफ आवाज उठाई थी।

पर्यावरण संरक्षण की ओर एक कदम

कागज़ को सामग्री के रूप में चुनना एक सोची-समझी रणनीति थी। सुरेखा बताती हैं कि भक्त अक्सर भगवान का नाम लिखने के लिए भारी मात्रा में कागज़ का उपयोग करते हैं, जो बाद में बेकार हो जाता है। इस बेकार कागज़ को पुनर्चक्रित करके मूर्तियों में बदलना एक शानदार समाधान निकला।

प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियाँ जो पानी में नहीं घुलतीं, पर्यावरण के लिए वास्तव में बेहद हानिकारक हैं।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, इस तरह की व्यक्तिगत पहल बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव ला सकती है। यह परिवार न केवल प्रदूषण कम कर रहा है, बल्कि धार्मिक परंपराओं को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने का एक नया तरीका भी सिखा रहा है।

निर्माण की जटिल प्रक्रिया

इन मूर्तियों का निर्माण एक वर्ष लंबे चक्र में चलता है। दिवाली के बाद कागज़ भिगोने से लेकर, जनवरी-फरवरी में सांचे बनाने, कास्टिंग, सैंडिंग और अंत में पेंटिंग तक, हर चरण में बारीकी की आवश्यकता होती है। विशेष बात यह है कि वे किसी भी रासायनिक रंग का उपयोग नहीं करते हैं।

विशेषतापारंपरिक PoP मूर्तियाँअग्रवाल परिवार की मूर्तियाँ
सामग्रीप्लास्टर ऑफ पेरिस (रसायन)पुनर्चक्रित कागज़ और प्राकृतिक रंग
पर्यावरण प्रभावजल प्रदूषण का कारणपूरी तरह पर्यावरण अनुकूल
पानी में घुलनशीलतानहीं घुलतीं15 मिनट में घुल जाती हैं

ये मूर्तियाँ 7 इंच से लेकर 5 फीट तक की होती हैं। इनका रंग करने के लिए मुल्तानी मिट्टी, गेरू और हल्दी जैसे प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है।

ऐतिहासिक संदर्भ और शिक्षा

पर्यावरण संरक्षण के प्रति इस जुनून को और मजबूती देने के लिए, सुरेखा अग्रवाल ने 2019 में कानून की डिग्री हासिल की। उनका मानना है कि पर्यावरण नियमों और उनके कार्यान्वयन को समझने के लिए कानूनी ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है।

Did You Know?: क्या आप जानते हैं कि यह परिवार बिना किसी सोशल मीडिया या औपचारिक मार्केटिंग के, केवल 'वर्ड ऑफ माउथ' के माध्यम से अपनी सभी 150-200 वार्षिक मूर्तियों की बिक्री कर लेता है?

Frequently Asked Questions

1. क्या ये मूर्तियाँ सुरक्षित हैं?
हाँ, ये पूरी तरह से प्राकृतिक सामग्री और रंगों से बनी हैं, जो जल निकायों को नुकसान नहीं पहुँचातीं।

2. क्या यह एक व्यवसाय है?
नहीं, परिवार इसे एक 'सेवा' के रूप में देखता है। उनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि स्थिरता का संदेश फैलाना है।