असम सरकार ने बजट में ग्रीन सेस लागू करने की घोषणा की, जिसका लक्ष्य पत्थर पीसने वाले, कोक‑आधारित उद्योग, ईंट की भट्ठी और अन्य प्रदूषक गतिविधियों से आय जुटाना है। इस फंड को वनरोपण, जल संरक्षण और हरित ऊर्जा जैसे पर्यावरणीय परियोजनाओं में उपयोग किया जाएगा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- असम में ग्रीन सेस लागू, प्रमुख प्रदूषक उद्योगों को लक्ष्य
- सेस की आय वनरोपण, जल प्रबंधन और हरित ऊर्जा में प्रयोग होगी
- बजट में 10 साल में तीन गुना वृद्धि, कुल 2 लाख करोड़ रुपये
असम के वित्त मंत्री जयन्ता मल्लाबरूह ने 10 जुलाई को पेश किए गए बजट में पर्यावरणीय दायित्व को सशक्त करने के लिये ‘ग्रीन सेस’ की पेशकश की। यह नीति उन उद्योगों पर अतिरिक्त कर लगाती है जो वायु, जल और भूमि को प्रदूषित करते हैं, जैसे कि पत्थर पीसने वाले, कोक‑आधारित कारखाने, ईंट की भट्ठी, पुरानी गाड़ियों का ट्रांसफर और व्यावसायिक जल निकासी।
नीति का पृष्ठभूमि और उद्देश्य
बजट प्रस्तुत करने के दौरान मल्लाबरूह ने कहा कि पर्यावरणीय क्षति का बोझ उन लोगों पर ही होना चाहिए जो इसे उत्पन्न करते हैं। ग्रीन सेस की आय को वनरोपण, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण, जल संसाधन प्रबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश किया जाएगा। यह कदम राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते जलवायु परिवर्तन के खिलाफ राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आर्थिक प्रभाव और राजस्व की संभावनाएं
असम का बजट आकार पिछले दशक में लगभग तीन गुना बढ़कर 2,00,782 करोड़ रुपये हो गया है, और बजट उपयोगिता 58% से बढ़कर 85% तक पहुंच गई है। ग्रीन सेस से अतिरिक्त राजस्व का अनुमान लगाते हुए, विशेषज्ञों का मानना है कि यह आय राज्य के सतत विकास लक्ष्यों को पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, खासकर जब जलवायु अनुकूलन और हरित ऊर्जा में निवेश की आवश्यकता बढ़ रही है।
संबंधित पहल और भविष्य की दिशा
बजट में अन्य प्रमुख पहलों में ड्रोन‑डिलीवरी द्वारा बीज बॉल का वितरण, असम की चाय‑गोल्फ ट्रेल को पर्यटन उत्पाद के रूप में बढ़ावा, और प्रोटॉन बीम थेरेपी के लिये 550 करोड़ रुपये की निवेश शामिल है। साथ ही, असम के असली व्यंजन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करने हेतु एक ब्रांडिंग योजना भी पेश की गई। ये सभी योजनाएँ राज्य को आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से दोधारी वृद्धि की ओर ले जाने का लक्ष्य रखती हैं।
भविष्य की चुनौतियां
ग्रीन सेस की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कैसे लागू किया जाता है और राजस्व को किस हद तक लक्ष्यित परियोजनाओं में चैनल किया जाता है। उद्योगों की संभावित प्रतिरोध और प्रशासनिक चुनौतियां इस नीति की सफलता को तय करेंगी। इसलिए, प्रभावी निगरानी तंत्र और पारदर्शी रिपोर्टिंग अनिवार्य होगी।