मेहबूबा मुफ्ती ने एक गंभीर चेतावनी दी है कि हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण शासन व्यवस्था ध्वस्त हो रही है और आम नागरिक इसका शिकार बन रहा है।
- ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं का पतन हो रहा है।
- समाज हिंसा और प्रशासनिक लापरवाही के प्रति उदासीन होता जा रहा है।
- मुस्लिम समुदाय अब टकराव के बजाय कानूनी और संवैधानिक रास्तों को चुन रहा है।
- बहुसंख्यक समाज जवाबदेही मांगने के बजाय धार्मिक पहचान के जाल में फंस गया है।
पूर्व जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने एक अत्यंत विचारोत्तेजक लेख में भारत की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर कड़ा प्रहार किया है। उनका तर्क है कि देश वर्तमान में एक खतरनाक '80-20' के खेल में फंसा हुआ है, जहाँ ध्रुवीकरण की राजनीति शासन की विफलता को छिपाने का काम कर रही है।
मुफ्ती ने हाल की कई दुखद घटनाओं का हवाला दिया, जिसमें दिल्ली के सत्य निकेतन में एक इमारत का गिरना और आगरा में एक गर्भवती महिला की एम्बुलेंस का गड्ढे में फंस जाना शामिल है। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब प्रशासन विफल होता है, तो पीड़ित केवल एक विशेष समुदाय का नहीं होता, बल्कि वह एक आम नागरिक होता है। लेकिन विडंबना यह है कि इन त्रासदियों पर समाज का आक्रोश अब बहुत कम होता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब समाज हिंसा और प्रशासनिक लापरवाही को 'सामान्य' मानने लगता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। मुफ्ती के अनुसार, यदि 80 प्रतिशत आबादी केवल धार्मिक पहचान के मुद्दों में उलझी रहेगी, तो वे उन बुनियादी सेवाओं की मांग करना भूल जाएंगे जो उनके जीवन के लिए अनिवार्य हैं—जैसे सुरक्षित सड़कें, अस्पताल और न्याय।
असली खतरा यह नहीं है कि भारत विभाजित रहेगा, बल्कि यह है कि जब शासन पूरी तरह ढह जाएगा, तो पीड़ित केवल हिंदू या मुस्लिम नहीं होंगे।
लेख में मुस्लिम समुदाय के बदलते व्यवहार पर भी प्रकाश डाला गया है। मुफ्ती बताती हैं कि सहारणपुर में मस्जिद विध्वंस जैसे मामलों में, मुस्लिम संगठन अब सड़कों पर उतरकर टकराव पैदा करने के बजाय कानूनी और संवैधानिक रास्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव है ताकि ध्रुवीकरण की राजनीति को 'ऑक्सीजन' न मिल सके।
उन्होंने पश्चिम बंगाल के उदाहरण का भी उल्लेख किया, जहाँ मुस्लिम विद्वानों ने ईदुल अज़हा के दौरान गाय की बलि से बचने की अपील की थी। यह 'प्रोएक्टिव' दृष्टिकोण सांप्रदायिक तनाव को कम करने का एक प्रयास है, हालांकि इसका आर्थिक प्रभाव हिंदू व्यापारियों पर भी पड़ा।
| मुद्दा | ध्रुवीकरण का प्रभाव | नागरिकों पर प्रभाव |
|---|---|---|
| स्वास्थ्य सेवा | धार्मिक विमर्श में उलझी | अस्पताल पहुँचने में देरी और मृत्यु |
| बुनियादी ढांचा | राजनीतिक मुद्दा बना | इमारतों का गिरना और सड़क दुर्घटनाएं |
| कानून व्यवस्था | पहचान आधारित राजनीति | हिंसा का सामान्यीकरण और चुप्पी |
Frequently Asked Questions
1. मेहबूबा मुफ्ती के अनुसार मुख्य खतरा क्या है?
मुख्य खतरा यह है कि ध्रुवीकरण के कारण लोग शासन की विफलता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर सवाल उठाना बंद कर रहे हैं।
2. मुस्लिम समुदाय की नई रणनीति क्या है?
मुस्लिम समुदाय अब टकराव के बजाय कानूनी उपचार और संवैधानिक शांति को प्राथमिकता दे रहा है ताकि सांप्रदायिक तनाव से बचा जा सके।