सरकार ने नागरिक पंजीकरण अधिनियम में संशोधन प्रस्तावित किया है, जिससे दो साल से अधिक देर से दर्ज किए गए जन्म‑और‑मृत्यु के मामलों को पहली श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। यह कदम रीयल‑टाइम डेटा सुनिश्चित करने और दुरुपयोग को रोकने हेतु उठाया गया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- देर से दर्ज किए गए जन्म‑और‑मृत्यु को पहली श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश से ही पंजीकृत किया जा सकेगा।
- जिला मजिस्ट्रेट, उप‑जिला या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की मौजूदा स्वीकृति को बदल दिया गया है।
- लक्षित उद्देश्य है रीयल‑टाइम डेटा सुनिश्चित करना और दुरुपयोग रोकना।
भारत सरकार ने जन्म‑और‑मृत्यु पंजीकरण अधिनियम में एक महत्वपूर्ण संशोधन पेश किया है, जिसमें दो साल से अधिक समय के बाद रिपोर्ट किए गए मामलों को केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश से ही पंजीकृत किया जा सकेगा। मौजूदा प्रावधान के तहत जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप‑जिला मजिस्ट्रेट (SDM) या कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमोदन संभव था।
पृष्ठभूमि और मौजूदा प्रक्रिया
वर्तमान में हर जन्म और मृत्यु को स्थानीय पंजीकार द्वारा 21 दिनों के भीतर डिजिटल सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) में दर्ज करना अनिवार्य है। यदि 30 दिन से अधिक लेकिन एक वर्ष के भीतर रिपोर्ट किया जाए, तो जिला पंजीकार या किसी निर्धारित अधिकारी की लिखित अनुमति आवश्यक होती है, साथ में शुल्क का भुगतान और आत्म‑प्रमाणित दस्तावेज़ जमा करना पड़ता है। एक साल से अधिक देर होने पर, सेक्शन 13(3) के तहत जिला मजिस्ट्रेट, SDM या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की स्वीकृति ली जा सकती थी।
प्रस्तावित संशोधन के प्रमुख बिंदु
नया संशोधन दो साल तक की देरी के बाद भी मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखेगा, पर दो साल से अधिक देर होने पर पहली श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य कर देगा। यह बदलाव गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया और बुधवार को कैबिनेट में प्रस्तुत किया गया।
उद्देश्य और संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सटीक जनसंख्या डेटा, स्वास्थ्य‑सेवा योजना और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए आवश्यक रीयल‑टाइम रिकॉर्डिंग को सुदृढ़ करेगा। साथ ही, फर्जी दस्तावेज़ और दुरुपयोग की संभावना को कम करने के लिए कड़ी जांच को बढ़ावा देगा। लेकिन यह बदलाव ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ न्यायिक पहुँच सीमित है, वहाँ प्रशासनिक बोझ और कानूनी उलझनें भी पैदा कर सकता है।
भविष्य की दिशा
यदि यह amendment पारित होता है, तो राज्य सरकारों को अपने पंजीकरण इकाइयों को न्यायिक मजिस्ट्रेटों के साथ समन्वय करने के लिए नई प्रक्रियाएँ स्थापित करनी होंगी। यह प्रक्रिया नागरिकों के लिए समय‑समय पर कानूनी सहायता की आवश्यकता भी बढ़ा सकती है, विशेषकर वंचित वर्गों के लिए। सरकार को इस दिशा में जागरूकता अभियान और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना आवश्यक होगा।