दिल्ली हाई कोर्ट के जज, बाद में मणिपुर के मुख्य न्यायाधीश, सिद्धार्थ मृदुल ने अपने न्यायिक पद पर रहते हुए बीपीसीएल की 'किचन फ्लेम' एजेंसी चलायी। यह मामला न्यायिक नैतिकता और अनुबंध उल्लंघन के गंभीर प्रश्न उठाता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- जज सिद्धार्थ मृदुल ने 16 साल तक न्यायिक पद पर रहते हुए एलपीजी एजेंसी चलायी।
- बीपीसीएल ने कई नोटिस भेजने के बाद 6 जुलाई को एजेंसी को निलंबित किया।
- इसी घटना ने न्यायिक नैतिकता और सरकारी अनुबंधों में पारदर्शिता पर नया सवाल खड़ा किया।
जज (सेवानिवृत्त) सिद्धार्थ मृदुल ने 2008 से 2024 तक दिल्ली हाई कोर्ट और बाद में मणिपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने निजी तौर पर बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड) के साथ 'किचन फ्लेम' नामक एलपीजी वितरण एजेंसी का अनुबंध नवीनीकृत किया, जो 1984 से उनके नाम पर चल रहा था।
पृष्ठभूमि और अनुबंध की अवधि
कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार, एजेंसी का नवीनीकरण 1995, 2005, 2010, 2015, 2025 और 2024 में किया गया, और यह 24 अगस्त 2030 तक वैध था। अनुबंध पर जज मृदुल की फोटो और हस्ताक्षर मौजूद हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने आधिकारिक पद पर रहते हुए भी निजी व्यापार को जारी रखा।
न्यायिक नैतिकता के उल्लंघन
संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों पर पारदर्शिता और हितों के टकराव से बचने के लिए कड़े नियम होते हैं। मृदुल ने इन नियमों का उल्लंघन किया, क्योंकि उन्होंने अपने पूर्णकालिक न्यायिक दायित्वों के साथ-साथ एजेन्सी को चलाया, जबकि बीपीसीएल ने इस बात पर कई बार स्पष्टीकरण माँगा।
बीपीसीएल की कार्रवाई और न्यायालय की प्रतिक्रिया
बीपीसीएल ने 29 मई 2025 को मृदुल को नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि उन्होंने अनुबंध के कई प्रमुख बिंदुओं का उल्लंघन किया है और एजेंसी को निलंबित करने का कारण बताया। मृदुल ने किसी भी नोटिस का जवाब नहीं दिया, जिसके बाद 6 जुलाई को बीपीसीएल ने एजेंसी को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया। इस बीच, एजेंसी के प्रबंधन में शामिल मोनिका यादव ने भी अपने अधिकारों को पुनःस्थापित करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
भविष्य के प्रभाव और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
यह मामला न केवल व्यक्तिगत न्यायाधीश की नैतिकता को प्रश्नांकित करता है, बल्कि पूरे भारतीय न्यायिक तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को उजागर करता है। संसद में न्यायिक अनुशासन को सख्त करने के प्रस्तावों पर इस घटना के बाद नई तेज़ी से चर्चा हो सकती है, जिससे भविष्य में न्यायाधीशों के व्यावसायिक हितों पर कड़ी निगरानी की संभावना बढ़ेगी।