लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार दो‑तीहाई बहुमत के करीब है, लेकिन अभी भी छह सीटों की कमी है। इस अंतर को भरने के लिए विपक्षी गठबंधन ने कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। अब सवाल यह है कि मॉनसून सत्र में परिसीमन (डेलिमिटेशन) को एजेंडा में लाया जाएगा या नहीं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मोदी सरकार दो‑तीहाई बहुमत के करीब, केवल 6 सांसदों की कमी
- विपक्षी गठबंधन ने बहुमत हासिल करने के लिए रणनीतिक गठजोड़ किए
- मॉनसून सत्र में परिसीमन को प्रमुख एजेंडा बनाने की संभावना बढ़ी
2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके राष्ट्रीय गठबंधन ने कुल 543 सीटों में से 292 सीटें सुरक्षित कर लीं, जिससे सरकार दो‑तीहाई बहुमत की सीमा के बेहद करीब पहुंच गई। हालांकि, अभी भी छह सीटों की कमी है, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता होगी।
विपक्षी गठबंधन की रणनीति
विपक्षी दलों ने इस अंतर को भेदने के लिए कई राजनयिक कदम उठाए हैं। कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) के बाहर के छोटे दल और स्वतंत्र सांसदों ने संभावित समर्थन के लिए बातचीत शुरू कर दी है। इन चर्चाओं में मुख्य मुद्दे विकास योजनाओं का पुनः मूल्यांकन, कृषि सुधारों की पुनर्समीक्षा, और रोजगार सृजन के लिए नई नीतियों पर केंद्रित हैं।
परिसीमन (डेलिमिटेशन) का एजेंडा
परिसीमन, अर्थात् निर्वाचन क्षेत्रों की पुनर्संरचना, भारतीय लोकतंत्र में एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। अंतिम बार 2008 में इसे लागू किया गया था, और तब से जनसंख्या में हुए परिवर्तन के कारण नई सीमा रेखाओं की मांग बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस वर्ष के मॉनसून सत्र में परिसीमन को एजेंडा में रखा गया, तो यह सरकार के लिए एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है—किसी भी नई सीमा रेखा से मौजूदा बहुमत को प्रभावित किया जा सकता है।
संभव परिदृश्य
यदि सरकार को दो‑तीहाई बहुमत हासिल करने के लिए अतिरिक्त छह सांसदों की जरूरत पड़े, तो संभावित समर्थन का स्रोत राज्यसभा में मौजूद छोटे दल या स्वतंत्र सांसद हो सकते हैं। साथ ही, यदि परिसीमन को संसद में लाया जाता है, तो विपक्षी दल इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ एक प्रमुख लड़ाई के रूप में उपयोग कर सकते हैं, जिससे संसद में बहस की तीव्रता बढ़ेगी।
भविष्य की दिशा
जैसे ही मॉनसून सत्र की तैयारी आगे बढ़ेगी, राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें इस बात पर टिकी रहेंगी कि किस प्रकार मोदी सरकार इस छोटी सी कमी को पाटेगी और क्या परिसीमन को राष्ट्रीय एजेंडा में शामिल किया जाएगा। यह न केवल अगले चुनावों के लिए बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संरचना के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।