सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई को उत्तर‑पूर्व राज्यों के निवासियों की सुरक्षा के लिये स्थापित पैनल की कार्यवाही पर सवाल उठाए। न्यायाधीश संजय कुमार ने बताया कि समिति के बैठकों में केवल चाय‑पानी की चर्चा हो रही है, वास्तविक कदम नहीं। यह मुद्दा तब उभरा जब एक महिला शिकायतकर्ता का पता नहीं लगाया जा सका, जबकि उसने ई‑मेल के माध्यम से शिकायत दर्ज की थी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सुप्रीम कोर्ट ने समिति की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए
- 2014 के बाद बने पैनल की वास्तविक कार्यवाही पर शंका
- महिला शिकायतकर्ता का पता न लग पाना प्रणाली की खामियों को उजागर करता है
नई दिल्ली, 15 जुलाई 2026 – सुप्रीम कोर्ट के एक विशेष विभाजन ने उत्तर‑पूर्व राज्यों के प्रवासियों की सुरक्षा हेतु 2014 में स्थापित मॉनिटरिंग कमिटी की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रश्न उठाया। न्यायाधीश संजय कुमार ने कहा कि इस पैनल की बैठकें केवल “चाय‑पानी की चर्चा” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि ठोस उपायों की आवश्यकता है।
पैनल का गठन और उसका मूल उद्देश्य
यह समिति एम.पी. बेज़बुराह रिपोर्ट के अनुशंसा पर बनाई गई थी, जब उत्तर‑पूर्व के अरुणाचल प्रदेश के छात्र निडो तानिया की दिल्ली में एक जातीय हिंसा के बाद मृत्यु हुई। तानिया की 19 वर्ष की उम्र में हुई यह त्रासदी सरकार को उत्तर‑पूर्व नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित करने के आदेश पर मजबूर कर गई।
समिति की संरचना और दायित्व
इस पैनल में गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न केंद्रीय विभागों के प्रतिनिधि और उत्तर‑पूर्व राज्यों के प्रतिनिधियों, जैसे अधिवक्ता अलाना गोलमेई, शामिल हैं। उनका काम सरकार द्वारा लागू किए गए सुरक्षा उपायों की निगरानी, उल्लंघनों की समीक्षा, और पीड़ितों की शिकायतें राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोगों तथा पुलिस को अग्रेषित करना है।
सुप्रीम कोर्ट की नई चुनौती
कोर्ट ने तब ध्यान आकर्षित किया जब सरकारी दस्तावेज़ों में एक महिला शिकायतकर्ता का पता नहीं मिल पाया, जबकि उसने ई‑मेल द्वारा अपनी शिकायत पैनल तक पहुंचा दी थी। अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल के.एम. नटराज ने बताया कि वास्तविक जाँच पुलिस करती है, जबकि समिति केवल शिकायतें संकलित करती है। यह विरोधाभास न्यायालय के प्रश्नों को और तीखा बनाता है।
भविष्य की दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि पैनल को केवल “सुनवाई” तक सीमित नहीं रहना चाहिए; उसे सक्रिय उपायों, समय‑सीमा‑बद्ध कार्य योजनाओं और पारदर्शी रिपोर्टिंग प्रणाली के साथ काम करना चाहिए। यदि यह लापरवाही जारी रहती है, तो उत्तर‑पूर्व समुदाय में विश्वास का क्षय और राष्ट्रीय एकता पर गहरा असर पड़ सकता है।