उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) ने रामपुर स्थित जौहर यूनिवर्सिटी के भीतर बनी सड़क को सार्वजनिक मार्ग घोषित कर दिया है। विभाग ने गेट पर साइनबोर्ड लगाकर स्पष्ट किया है कि सरकारी फंड से बनी यह सड़क आम जनता के लिए खुली है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- यूपी PWD ने जौहर यूनिवर्सिटी के भीतर 3.3 किमी लंबी सड़क को सार्वजनिक मार्ग घोषित किया।
- यह सड़क 2016-17 में लगभग 13.5 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित की गई थी।
- विवाद के कारण वर्षों से आम जनता के लिए यह रास्ता बंद था।
- मामला वर्तमान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है।
उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गरमा गया है। उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) ने एक बड़ा कदम उठाते हुए विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर एक साइनबोर्ड लगा दिया है, जिसमें स्पष्ट रूप से घोषणा की गई है कि विश्वविद्यालय के भीतर से गुजरने वाली सड़क एक सार्वजनिक मार्ग है और यह आम जनता के उपयोग के लिए उपलब्ध है।
सरकारी धन और निर्माण का इतिहास
PWD के अधिकारियों के अनुसार, यह विवाद केवल एक सड़क का नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति के उपयोग का है। यह 3.3 किलोमीटर लंबी फोर-लेन सीमेंट कंक्रीट सड़क वर्ष 2016-17 के दौरान निर्मित की गई थी। इस परियोजना के लिए लगभग 16 करोड़ रुपये का प्रशासनिक अनुमोदन प्राप्त किया गया था, जिसमें से लगभग 13.5 करोड़ रुपये की सिविल निर्माण लागत शामिल थी। चूँकि इस सड़क का निर्माण सरकारी खजाने से हुआ है, इसलिए विभाग का तर्क है कि इस पर विश्वविद्यालय का निजी अधिकार नहीं हो सकता।
विवाद की जड़ और कानूनी पेच
PWD के अधिशासी अभियंता किशन वीर सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रबंधन ने वर्ष 2019 में मुख्य गेट बंद कर दिया था, जिससे न केवल आम जनता बल्कि PWD के अधिकारियों को भी प्रवेश करने से रोक दिया गया था। इस अवरोध के बाद विभाग ने कानूनी कार्रवाई शुरू की। हालांकि, मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहुंच गया और विश्वविद्यालय ने स्टे ऑर्डर प्राप्त कर लिया, जिसके कारण पिछले कुछ वर्षों से मामले की सुनवाई लंबित चल रही है।
भविष्य की रणनीति और प्रभाव
विभाग ने अब स्पष्ट कर दिया है कि वह इस सड़क को सार्वजनिक उपयोग के लिए खुला रखेगा। अभियंता ने कहा, "यह लालपुर बांध को जोड़ने वाली एक सरकारी सड़क है। हम विश्वविद्यालय परिसर के भीतर भी अतिरिक्त साइनबोर्ड लगाएंगे ताकि यात्रियों को पता रहे कि यह एक सार्वजनिक मार्ग है।" विभाग अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जल्द सुनवाई के लिए प्रयास कर रहा है ताकि यह अंतिम निर्णय लिया जा सके कि विश्वविद्यालय का गेट वहां रहेगा या उसे हटा दिया जाएगा। यह मामला उत्तर प्रदेश की राजनीति और सरकारी संपत्तियों के प्रबंधन पर एक नई बहस छेड़ सकता है।