सुप्रीम कोर्ट की दो‑साल‑पाँच‑महीने की आश्वासन के बाद भी केंद्र सरकार ने राज्यस्थिति बहाल करने में कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिससे प्रदेश में राजनीतिक असंतोष बढ़ रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2½ साल पहले केंद्र को राज्यस्थिति बहाल करने का आश्वासन दिया।
  • बीजेपी सरकार ने सुरक्षा कारणों को बहाना बनाकर कार्रवाई में देरी की है।
  • ओमर अब्दुल्ला की जंतर मंचर में धरना इस असंतोष का स्पष्ट संकेत है।

जम्मू‑कश्मीर की राज्यस्थिति बहाल करने का वादा भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दर्ज है, लेकिन दो‑साल‑पाँच‑महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई ठोस प्रगति नहीं दिखाई गई। यह देरी केवल प्रशासनिक अकारण नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित की गहरी चालबाज़ी को दर्शाती है।

सुप्रीम कोर्ट का आश्वासन और उसके बाद की प्रतिबद्धताएँ

जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह आश्वासन दिया कि वह जम्मू‑कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य बनाएगी। इस आदेश में कोई समय‑सीमा नहीं निर्धारित की गई, परन्तु यह स्पष्ट था कि “उचित अवधि” के भीतर कदम उठाए जाने चाहिए। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने संसद एवं जनसमूह में बार‑बार इस वादे की पुष्टि की।

बीजेपी सरकार की प्रतिक्रिया‑हीनता

इन सार्वजनिक आश्वासन के बावजूद, भाजपा‑नेतृत्व वाली सरकार ने कोई ठोस नीति या विधायी कदम नहीं उठाया। केंद्र ने सुरक्षा को प्रमुख कारण बना कर इस मुद्दे को टाल दिया, जबकि वही सुरक्षा कारण पिछले वर्ष पहलगाम हमले के बाद ही उठाया गया था। सरकार ने कहा कि वह “ऑपरेशन सिंधूर” के बाद सीमा पार उकसावन के कारण सतर्क है, परन्तु इस तरह की सुरक्षा चिंताओं को राज्यस्थिति के प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता।

स्थानीय राजनीति और सामाजिक असंतोष

जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने इस निष्क्रियता के जवाब में कई रैलियों और जंतर मंचर में धरने का आयोजन किया। उनका मुख्य आरोप यह है कि आज भी प्रदेश एक संघीय क्षेत्र (UT) बनाकर चुने हुए सरकार को एक अघोषित लीज़ेंट गवर्नर के अधीन रखा गया है, जिससे प्रशासनिक कार्यों में लोकतांत्रिक जवाबदेही घटती है। यह व्यवस्था न केवल संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि स्थानीय जनता के भरोसे को भी कमजोर करती है।

भौगोलिक‑सांस्कृतिक क्षेत्रों में समान पैटर्न

जम्मू‑कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख और मणिपुर में भी केंद्र ने समान रणनीति अपनाई है—वोटिंग के बाद भी प्रदेश को संघीय क्षेत्र में ही रखकर स्थानीय नेतृत्व को सीमित अधिकार देना। यह नीति उत्तर‑पश्चिम, पश्चिम और अब पूर्वी सीमाओं में जनसंख्या के अल्पसंख्यक वर्गों को “विकल्पहीन” बना देती है, जिससे असंतोष और अस्थिरता बढ़ती है।

राजनीतिक गणित बनाम संवैधानिक दायित्व

विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा इस मुद्दे को तब तक टालती रहेगी जब तक डेलिमिटेशन प्रक्रिया के बाद विधानसभा में उनका गणितीय लाभ स्पष्ट न हो। लेकिन संवैधानिक वादे को राजनीति के लिए उपकरण बनाकर स्थगित करना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। जनता का भरोसा तभी बहाल होगा जब केंद्र राज्यस्थिति को वास्तविकता बनाकर संस्थागत स्थिरता प्रदान करेगा।