कांग्रेस अध्यक्ष मल्लीकरजुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संविधान (131वां संशोधन) बिल पर चर्चा के लिए सभी दलों की बैठक करने का पत्र लिखा। उन्होंने सरकार की सीमांकन बिल को पुनः पेश करने की संभावना को उजागर किया और विपक्ष को पर्याप्त समय माँगा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- खड़गे ने मोदी को सीमांकन बिल पर चर्चा हेतु सभी‑पार्टी बैठक का अनुरोध किया।
- सरकार मोनसून सत्र में बिल को पुनः पेश करने की तैयारी में है।
- कांग्रेस का दावा है कि संविधान संशोधन के लिए दो‑तीहाई बहुमत अभी नहीं है।
नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लीकरजुन खड़गे ने 17 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक औपचारिक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने संशोधित संविधान (131वां संशोधन) बिल, यानी सीमांकन बिल, पर सभी‑पार्टी चर्चा का अनुरोध किया। यह पत्र तब आया जब मीडिया रिपोर्टों में बताई गई कि सरकार मोनसून सत्र में इस बिल को पुनः पेश करने की सोच रही है।
पृष्ठभूमि और राजनीतिक माहौल
सीमांकन बिल को अप्रैल 17 को लोकसभा में अस्वीकृत किया गया था, क्योंकि विपक्ष ने इसे केवल महिलाओं के आरक्षण के नाम पर पेश किया हुआ बताया, जबकि वास्तविक उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण था – जिससे भाजपा को लाभ और दक्षिणी राज्यों को नुकसान पहुँचाने की संभावना थी। खड़गे ने पहले बजट सत्र में ही संसदीय मामलों के मंत्री से ऐसी बैठक का अनुरोध किया था, पर वह नहीं मान्य हुआ।
कांग्रेस का रणनीतिक कदम
खड़गे का यह कदम कांग्रेस की व्यापक रणनीति को दर्शाता है, जिसमें वह सभी विरोधी दलों – जैसे डि.एम.के., एन.सी.पी., और एस.पी. – के साथ संपर्क में है, ताकि सीमांकन बिल के पुनः परिचय के खिलाफ एकत्रित मत हासिल किया जा सके। कांग्रेस का मानना है कि वर्तमान में प्रधानमंत्री की सरकार को संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो‑तीहाई बहुमत नहीं मिला है, खासकर टी.एम.सी. और शिवसेना के विभाजन को देखते हुए।
संभावित प्रभाव और विशेषज्ञों की राय
यदि सीमांकन बिल पुनः पेश होता है, तो यह भारत की प्रतिनिधित्व प्रणाली में बड़े बदलावों की ओर इशारा करेगा। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को घटा सकता है, जबकि उत्तर में बढ़ा सकता है। कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने कहा है कि ऐसे बड़े परिवर्तन को पारित करने के लिए व्यापक बहुमत आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक वैधता बनी रहे। विपक्ष की सक्रिय भागीदारी ही इस मुद्दे को संवैधानिक और न्यायसंगत बनाने की कुंजी होगी।
आगे का रास्ता
खड़गे ने मोदी को अनुरोध किया है कि वह सभी दलों को बिल का विस्तृत विवरण प्रदान करें और संसद में पेश करने से पहले पर्याप्त समय दें। यदि सरकार इस अनुरोध को नज़रअंदाज़ करती है, तो यह राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है, जिससे आगामी संसद सत्र में बहसें तीव्र हो सकती हैं। इस बीच, कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस बिल को रोकने के लिए विभिन्न उपायों की तैयारी कर रहे हैं।