एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के विदेश मंत्रालय के बचाव की कड़ी आलोचना की है। गिल्ड ने इसे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताया है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (EGI) ने विदेश मंत्रालय (MEA) के हालिया स्पष्टीकरण का कड़ा विरोध किया है।
  • MEA ने तर्क दिया था कि PM मोदी सीधे जनता से संवाद करना पसंद करते हैं, जिससे वे मीडिया से बचते हैं।
  • EGI ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया युद्ध जैसे गंभीर मुद्दों पर PM की चुप्पी चिंताजनक है।

नई दिल्ली: भारत के मीडिया जगत के शीर्ष संगठन, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (EGI) ने गुरुवार को एक तीखा बयान जारी करते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) के उस तर्क को 'गहराई से त्रुटिपूर्ण' करार दिया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीडिया से दूरी को सही ठहराया गया था।

विवाद की जड़: MEA का तर्क बनाम मीडिया की मांग

हाल ही में, विदेश मंत्रालय के कुछ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री द्वारा देश या विदेश में अनस्क्रिप्टेड (बिना तैयारी वाले) प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के सवाल पर सफाई दी थी। मंत्रालय का तर्क था कि एक सफल राजनीतिज्ञ के रूप में, प्रधानमंत्री मोदी सीधे अपने ग्रामीण मतदाताओं से संवाद करना पसंद करते हैं। हालांकि, एडिटर्स गिल्ड ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री की मीडिया से दूरी बनाने का एक बहाना मात्र है।

वैश्विक संकट और जवाबदेही का प्रश्न

गिल्ड ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं जहाँ प्रधानमंत्री मीडिया से दूरी बना सकें। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए अभूतपूर्व ऊर्जा संकट जैसे विशाल मुद्दों पर देश को प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण की आवश्यकता है। EGI के अनुसार, प्रधानमंत्री को न केवल ग्रामीण बल्कि शहरी आबादी को भी महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर नियमित रूप से जवाब देना चाहिए।

लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि जब शीर्ष नेतृत्व मीडिया के सवालों का सामना करने से बचता है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांतों को कमजोर करता है। एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि प्रधानमंत्री का मीडिया के साथ संवाद साझा करने में अनिच्छा दिखाना, विशेष रूप से वैश्विक संकटों के इस दौर में, जनता के सूचना के अधिकार को प्रभावित करता है। यह बहस अब और तेज होने की संभावना है क्योंकि विपक्ष और नागरिक समाज भी सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं।