कर्नाटक में चल रहे विशेष गहन संशोधन (SIR) के कारण लॉजिस्टिक चुनौतियों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु के नगर निगम चुनावों को दिसंबर 2026 तक टाल दिया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु के 369 वार्डों के चुनावों को दिसंबर 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया है।
- बेंगलुरु ग्रेटर अथॉरिटी (GBA) ने 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) के कारण संसाधनों की कमी का हवाला दिया।
- चुनावों में देरी को लेकर कोर्ट ने पहले भी GBA की कड़ी आलोचना की थी।
- कर्नाटक में मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन 7 अक्टूबर को होना निर्धारित है।
नई दिल्ली: देश की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु में स्थानीय निकाय चुनावों का इंतजार अब और लंबा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) और कर्नाटक राज्य चुनाव आयोग की दलीलों को स्वीकार करते हुए, बेंगलुरु की पांच नगर निगमों के तहत आने वाले 369 वार्डों के लिए नागरिक चुनावों की समयसीमा को बढ़ाकर दिसंबर 2026 कर दिया है।
लॉजिस्टिक चुनौतियों का हवाला
GBA ने अदालत में तर्क दिया कि वर्तमान में कर्नाटक में चल रहा 'विशेष गहन संशोधन' (Special Intensive Revision - SIR) एक अत्यंत श्रम-प्रधान कार्य है। इस प्रक्रिया के लिए भारी मात्रा में मानव संसाधन की आवश्यकता होती है। GBA के अनुसार, इस कार्य में 8,872 बूथ स्तर के अधिकारी, 938 पर्यवेक्षक और दर्जनों पंजीकरण अधिकारी शामिल हैं, जो वर्तमान में मतदाता सूची के पुनरीक्षण में व्यस्त हैं।
बेंगलुरु अकेले राज्य के कुल 5.54 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 1.03 करोड़ मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है। लगभग 40 लाख घरों में जाकर मतदाता सूची को अपडेट करना एक विशाल प्रशासनिक चुनौती है, जिसके कारण चुनाव प्रक्रिया को समय पर पूरा करना लगभग असंभव हो गया है।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी और राजनीतिक शून्यता
इस मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने GBA के प्रति सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने हल्के लेकिन गंभीर लहजे में पूछा कि क्या दिसंबर में वे फिर से कोई नया कारण देकर विस्तार की मांग करेंगे? इससे पहले, अदालत ने GBA पर 'विलंबकारी रणनीति' (delaying tactics) अपनाने का आरोप लगाते हुए कड़ी आलोचना की थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी GBA का बचाव करते हुए कहा कि वे भविष्य में ऐसे किसी और विस्तार के प्रयास का समर्थन नहीं करेंगे। इस देरी का सीधा असर बेंगलुरु के शासन पर पड़ रहा है, क्योंकि वर्तमान में शहर एक राजनीतिक नेतृत्व के अभाव में कार्य कर रहा है, जिससे नागरिक सुविधाओं के प्रबंधन में बाधा आ रही है।