आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ अमरवती लैंड पूलिंग मामले में दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे 'राजनीतिक प्रतिशोध' करार देते हुए नीतिगत निर्णयों को आपराधिक नहीं ठहराया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और मंत्री पोंगुरू नारायण के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज कर दिया।
  • अदालत ने अमरवती लैंड पूलिंग योजना से जुड़ी जांच को 'राजनीतिक प्रतिशोध' और 'दुर्भावनापूर्ण' बताया।
  • न्यायाधीश ने कहा कि सत्ता परिवर्तन के साथ नीतिगत निर्णयों को आपराधिक बनाना भारतीय राजनीति की एक चिंताजनक प्रवृत्ति है।
  • फैसले में महाभारत, भगवद गीता और सिंड्रेला के रूपकों का उपयोग करते हुए न्याय की व्याख्या की गई।

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और नगर प्रशासन एवं शहरी विकास मंत्री पोंगुरू नारायण के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया है। यह मामला अमरवती राजधानी क्षेत्र के लिए लागू की गई 'लैंड पूलिंग योजना' में कथित अनियमितताओं से संबंधित था।

न्यायिक टिप्पणी: सिंड्रेला और राजनीति का संगम

न्यायमूर्ति वाई लक्ष्मण राव ने इस मामले की सुनवाई करते हुए बेहद तीखी और साहित्यिक टिप्पणी की। अदालत ने सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया की तुलना बदलते मौसमों से की और कहा कि हर नया शासन अपने साथ पिछले शासन के खिलाफ एफआईआर की एक नई फसल लेकर आता है। अदालत ने एक दिलचस्प उपमा देते हुए कहा, "सरकारी आदेश चुनाव के साथ ही प्रशासनिक कार्यों से बदलकर कथित अपराध के औजार बन जाते हैं—ठीक वैसे ही जैसे सिंड्रेला का रथ आधी रात को कद्दू में बदल जाता है।"

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क

यह विवाद 2021 में शुरू हुआ था, जब तत्कालीन मंगलगिरी विधायक अला रामकृष्ण रेड्डी की शिकायत पर सीआईडी ने मामला दर्ज किया था। आरोप था कि तत्कालीन टीडीपी सरकार ने 2016 में एक सरकारी आदेश जारी कर कुछ श्रेणियों की आवंटित भूमि पर लैंड पूलिंग लाभों का विस्तार किया था, जिससे निजी व्यक्तियों को अनुचित लाभ हुआ।

नायडू के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि यह एक पारदर्शी नीतिगत निर्णय था जिसे केवल इसलिए अपराधी घोषित किया जा रहा है क्योंकि वर्तमान सरकार पूर्ववर्ती सरकार की नीतियों से असहमत है। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी नीतिगत निर्णय को केवल सत्ता बदलने के आधार पर आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।

महाभारत और गीता का संदर्भ

अपने फैसले में अदालत ने महाभारत के शांति पर्व का उल्लेख करते हुए न्याय को सर्वोच्च धर्म बताया। साथ ही, भगवद गीता के श्लोक "उद्धरेदात्मनात्मानं..." का उद्धरण देते हुए अदालत ने मन की शक्ति और विवेक पर जोर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शासन के निर्णयों को आपराधिक साजिश में नहीं बदला जा सकता और आपराधिक कानून का राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करना लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।