मद्रास उच्च न्यायालय ने कानून अधिकारियों की नियुक्ति से जुड़ी याचिका से तमिलनाडु वेत्री कझगम (TVK) के प्रमुख विजय और 'बसी' आनंद के नाम हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि कुछ नामों को केवल 'हेडलाइंस' बटोरने के लिए शामिल किया गया था।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मद्रास उच्च न्यायालय ने TVK नेता विजय और 'बसी' आनंद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को याचिका से बाहर कर दिया है।
- अदालत ने कहा कि निजी उत्तरदाताओं के नाम केवल सुर्खियों में आने के उद्देश्य से जोड़े गए थे।
- याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करते हुए सरकार ने उनके आवेदन पर विचार करने का आश्वासन दिया है।
- न्यायाधीश ने चयन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के आरोपों पर स्पष्ट रुख अपनाया।
चेन्नई स्थित मद्रास उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय सुनाते हुए, जिला न्यायालयों में कानून अधिकारियों की नियुक्ति से संबंधित एक रिट याचिका से तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के संस्थापक और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय, पार्टी महासचिव 'बसी' एन. आनंद और जिला सचिव एन. मोहनराज के नाम हटाने का निर्देश दिया।
न्यायालय की तीखी टिप्पणी
न्यायमूर्ति मोहम्मद शफीक ने इस मामले की सुनवाई के दौरान रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि याचिका में इन नेताओं के नामों को हटा दिया जाए। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के वकील ने इन निजी उत्तरदाताओं के खिलाफ मामले को आगे न बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की थी। न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा कि इन राजनीतिक दिग्गजों के नामों को याचिका में केवल "हेडलाइंस बटोरने" (hit the headlines) के लिए शामिल किया गया प्रतीत होता है।
नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार का पक्ष
अधिवक्ता जनरल विजय नारायण ने अदालत को सूचित किया कि जिला न्यायालयों में कानून अधिकारियों के पदों पर नियुक्तियां प्रक्रियाधीन हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछले अधिकारियों का कार्यकाल 30 जून को समाप्त होने के कारण, राज्य सरकार ने अस्थायी नियुक्तियां (अधिकतम छह महीने के लिए) करने का निर्णय लिया है ताकि अदालतों में प्रतिनिधित्व की कमी न रहे। अदालत ने याचिकाकर्ता, वकील एम. ज्ञानसौंदरी के आवेदन को भी भविष्य की नियुक्तियों में विचार करने का आश्वासन दिया है।
भ्रष्टाचार के आरोपों पर अदालत का रुख
याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में पक्षपात का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि कुछ अपात्र व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है। हालांकि, न्यायमूर्ति शफीक ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता के पास भ्रष्टाचार के ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें पुलिस में आपराधिक शिकायत दर्ज करनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि सत्ताधारी दल (TVK) के अलावा अन्य दलों (DMK और AIADMK) के वकीलों का भी चयन हुआ है, तो यह प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को दर्शाता है, न कि पक्षपात को।