मद्रास हाई कोर्ट ने एल. इधयवर्मन के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। न्यायाधीश जी.के. इलंथिरायन ने पुलिस को चार हफ्तों में पूरी जांच करके अंतिम रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया।
मुख्य बिंदु
- कोर्ट ने FIR को रद्द करने की याचिका को अस्वीकार किया।
- पुलिस को चार हफ्तों में पूर्ण रिपोर्ट पेश करने का आदेश मिला।
- मामला राजनीतिक प्रेरणा से जुड़ा माना गया है।
मद्रास हाई कोर्ट ने 3 अगस्त 2026 को पूर्व डीएमके विधायक एवं वर्तमान थिरुपोरुर पंचायत यूनियन अध्यक्ष एल. इधयवर्मन के खिलाफ मैमल्लापुरम पुलिस द्वारा दर्ज First Information Report (FIR) को क्वैश करने की मांग को खारिज कर दिया। यह FIR नेमेली समुद्री जल नमककरण संयंत्र में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप पर दायर थी, जो 6 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की यात्रा से ठीक पहले हुआ था।
न्यायाधीश जी.के. इलंथिरायन ने वीडियो क्लिप देखी, जिसमें इधयवर्मन को सुरक्षा जाल तोड़ते हुए दिखाया गया। राज्य सार्वजनिक अभियोजक आर. जॉन सत्या ने कहा कि यह क्लिप डेमके आईटी विंग द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई थी। इस क्लिप में दिखाया गया कि कैसे वह कार से उतर कर मरम्मत के तहत एक जलमार्ग के चारों ओर लगे हरे सुरक्षा जाल को फाड़ते हैं, जिससे सार्वजनिक निधि को लगभग ₹10,000 का नुकसान हुआ।
संयुक्त जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड (CMWSSB) के सहायक अभियंता वी. मलरसेल्वम ने 7 जुलाई को शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि इधयवर्मन ने दो अन्य लोगों के साथ 5 जुलाई को रात 9:30 बजे संयंत्र में प्रवेश करके जाल तोड़ दिया। उन्होंने अदालत से FIR दर्ज करने और उचित आपराधिक कार्रवाई का अनुरोध किया।
इधयवर्मन ने FIR क्वैश याचिका में कहा कि उन्होंने 5 जुलाई को संयंत्र का दौरा केवल इसलिए किया क्योंकि उन्हें बताया गया था कि CMWSSB ने उनके पार्टी नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नाम का पटल हटा दिया था, जिसे हरे जाल से ढका गया था। उन्होंने इस मामले को राजनीतिक उत्पीड़न बताया और मीडिया को इस मुद्दे को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का आरोप लगाया।
Historical Background
नेमेली जल नमककरण संयंत्र को 2024 में एम.के. स्टालिन ने अनावरण किया था, जो राज्य के जल सुरक्षा पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस परियोजना को सार्वजनिक जल आपूर्ति में सुधार और समुद्री जल को पीने योग्य बनाने के लिए स्थापित किया गया था।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the court’s refusal to quash the FIR underscores the judiciary’s stance against political interference in environmental governance, setting a precedent for accountability of public officials.
"राजनीतिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को भी सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के नियमों से बाहर नहीं माना जा सकता," कहा पर्यावरण कानून विशेषज्ञ डॉ. अनीता राव।
Frequently Asked Questions
Q: क्या इधयवर्मन को जेल की सजा हो सकती है?
A: यदि जांच में उन्हें दोषी पाया जाता है तो सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के तहत दंडनीय सजा हो सकती है।
Q: इस मामले में राजनीतिक कारणों का क्या प्रभाव है?
A: कोर्ट ने संकेत दिया है कि राजनीतिक कारणों को न्यायिक प्रक्रिया में नहीं ले जाया जाएगा, जिससे निष्पक्ष जांच सुनिश्चित होगी।