लोकसभा ने 38 तक जजों की संख्या बढ़ाने का विधेयक बिना बहस के पास कर दिया। इसी सप्ताह पहले जन्म‑और‑मृत्यु पंजीकरण सुधार बिल भी बिना चर्चा के पारित हुआ।

Key Takeaways

  • सुप्रीम कोर्ट के पदों की संख्या 38 तक बढ़ेगी
  • विधेयक को आवाज़ वोट से पारित किया गया
  • विपक्ष के विरोधी प्रस्ताव को भी अस्वीकृत किया गया

हाउस ऑफ़ पिपल्स ने आज एक महत्वपूर्ण विधेयक को मंजूरी दी, जिसके तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 38 तक बढ़ेगी। यह कदम एक विस्तारित न्यायिक कार्यभार को संभालने के लिए उठाया गया है।

विरोधी दलों द्वारा प्रस्तुत एक वैधानिक प्रस्ताव, जिसमें मौजूदा आदेश के खिलाफ आवाज़ वोट के माध्यम से अस्वीकृति की गई, को भी नकारा गया। इस प्रक्रिया में कोई विस्तृत बहस नहीं हुई, जिससे विधायी तेज़ी पर सवाल उठे।

पिछले सप्ताह, जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन बिल को भी बिना चर्चा के पारित किया गया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान सत्र में विधायी कार्यवाही तेज़ गति से चल रही है।

Historical Background

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या पहले 2009 में 34 तक बढ़ाई गई थी। तब से, केस लोड में निरंतर वृद्धि ने कई बार अतिरिक्त जजों की मांग को जन्म दिया है, लेकिन संसद में हमेशा सहमति नहीं बन पाई।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that expanding the bench could reduce case backlogs, but it also raises concerns about judicial independence and the criteria for appointing new judges.

"बिना विस्तृत चर्चा के इस तरह की संवैधानिक बदलाव न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को प्रभावित कर सकते हैं," कहा वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ ने।
Did You Know?: भारत के सुप्रीम कोर्ट का पहला जज 1950 में नियुक्त हुआ था, और उसका प्रारम्भिक आकार केवल 7 सदस्य थे।

Frequently Asked Questions

क्या यह विस्तार केस बैकलॉग को कम करेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि अतिरिक्त जज केस प्रॉसेसिंग को तेज़ करेंगे, पर प्रभाव समय के साथ स्पष्ट होगा।

विपक्ष का विरोध किस कारण से था? मुख्य कारण थे नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और न्यायिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव।