मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अन्य राज्यों से आए निवासियों से अपील की है कि वे 2026 की जनगणना में अपनी मातृभाषा 'असमिया' दर्ज करें ताकि राज्य की जनसांख्यिकीय पहचान सुरक्षित रहे।
- सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने गैर-मूल निवासी निवासियों से 2026 की जनगणना में खुद को असमिया भाषी बताने का आग्रह किया।
- आंकड़ों के अनुसार, असमिया भाषियों की संख्या 1971 में 59.53% से गिरकर 2011 में 48.38% रह गई है।
- इस कदम का उद्देश्य स्वदेशी असमिया लोगों को 'अल्पसंख्यक' होने से बचाना है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने वर्तमान जनगणना प्रक्रिया के दौरान एक महत्वपूर्ण अपील की है। उन्होंने उन लोगों से, जो मूल रूप से अन्य राज्यों के निवासी हैं लेकिन अब असम में बस चुके हैं, अनुरोध किया है कि वे अपनी मातृभाषा के रूप में 'असमिया' दर्ज करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि 2026 में एकत्र किए गए आंकड़ों के आधार पर ही देश और राज्य के भविष्य की योजनाएं बनाई जाएंगी।
मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से राजस्थान या अन्य राज्यों से आए उन व्यक्तियों को संबोधित किया, जिन्होंने अलग भाषा और संस्कृति के साथ असम में प्रवेश किया, लेकिन अब वे खुद को 'गर्वित असमिया' मानते हैं। यह अपील ऐसे समय में आई है जब जनगणना का स्व-गणना चरण समाप्त हो चुका है और अब हाउस लिस्टिंग और फील्ड ऑपरेशन का दौर शुरू हो रहा है।
जनसांख्यिकीय गिरावट का संकट
इस अपील के पीछे मुख्य कारण असमिया भाषियों की संख्या में लगातार हो रही गिरावट है। आंकड़ों के अनुसार, असमिया को मातृभाषा बताने वालों का प्रतिशत 1971 में 59.53% था, जो 1991 में 57.81%, 2001 में 48.80% और 2011 में 48.38% रह गया। इसके विपरीत, बंगाली और हिंदी बोलने वालों की संख्या में वृद्धि देखी गई है।
| जनगणना वर्ष | असमिया भाषी (%) | बंगाली भाषी (%) | हिंदी भाषी (%) |
|---|---|---|---|
| 1971 | 59.53% | 19.7% | 5.42% |
| 1991 | 57.81% | 21.67% | - |
| 2001 | 48.80% | 27.55% | - |
| 2011 | 48.38% | 28.91% | 6.73% |
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक भाषाई अनुरोध नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। हिंदी भाषी गैर-मूल निवासियों को असमिया पहचान अपनाने के लिए प्रोत्साहित करके, सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि असमिया भाषी लोग अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक न बन जाएं। यह रणनीति भाजपा को 'मूल निवासियों के रक्षक' के रूप में पेश करने में मदद करती है।
'असमिया' पहचान की बदलती परिभाषा का उपयोग एक राजनीतिक उपकरण के रूप में किया जा रहा है ताकि 'हम' बनाम 'वे' का नैरेटिव बनाया जा सके।
इतिहास गवाह है कि बंगाली मूल के मुसलमानों, जिन्हें 'ना-असोमिया' (नव-असमिया) कहा जाता है, ने सबसे पहले असमिया भाषा को अपनाया था ताकि वे राज्य की संस्कृति में घुल-मिल सकें। इससे 1951 और 1971 की जनगणना में असमिया भाषियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई थी। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक माहौल में पहचान का यह खेल अधिक जटिल हो गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सीएम जनगणना में मातृभाषा बदलने का आग्रह क्यों कर रहे हैं?
सीएम चाहते हैं कि अन्य राज्यों से आए लोग असमिया पहचान अपनाएं ताकि स्वदेशी असमिया भाषी जनसंख्या का प्रतिशत कम न हो और वे अल्पसंख्यक न बनें।
किन समूहों को इस अपील से छूट दी गई है?
बोडो और करबी जैसे आदिवासी समुदायों और बराक घाटी के बंगाली भाषी निवासियों को अपनी पहचान चुनने की पूरी छूट दी गई है।