वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं मनीष तिवारी और विवेक तन्खा ने संसदीय प्रश्नों को नियमित रूप से खारिज करने का मुद्दा उठाया है, जिसे उन्होंने सरकार की जवाबदेही से बचने की एक सोची-समझी रणनीति बताया है।
- कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी और विवेक तन्खा ने संसदीय सवालों को खारिज करने के व्यवस्थित पैटर्न का आरोप लगाया है।
- मनीष तिवारी का दावा है कि 2020 से 2025 के बीच चीन सीमा विवाद और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर उनके 120 से अधिक सवाल खारिज किए गए।
- विवेक तन्खा ने बताया कि राज्यसभा के वर्तमान सत्र में 90 सवालों में से 10 से कम के जवाब मिले।
- कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने भी NEET-UG विरोध प्रदर्शनों से जुड़े सवालों के खारिज होने की बात कही है।
भारत की विधायी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वरिष्ठ कांग्रेस सांसदों मनीष तिवारी और विवेक तन्खा ने आरोप लगाया है कि कार्यपालिका नियमित रूप से संसदीय निगरानी को दरकिनार कर रही है। सोमवार को इन नेताओं ने दावा किया कि सांसदों द्वारा पूछे गए सवालों को या तो शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया जाता है या उन्हें बिना जवाब के छोड़ दिया जाता है, जिससे सरकार की जवाबदेही समाप्त हो रही है।
चंडीगढ़ से लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश करते हुए कहा कि सितंबर 2020 और अगस्त 2025 के बीच उनके द्वारा प्रस्तुत 120 से अधिक सवालों को अस्वीकार कर दिया गया। इन सवालों में चीनी सीमा पर घुसपैठ, ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद, रूस से कच्चे तेल का आयात और किसान आंदोलनों जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल थे। तिवारी ने आरोप लगाया कि सरकार उन सवालों से डरती है जो उसके लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं, इसलिए उन्हें "तुच्छ नियमों" का हवाला देकर खारिज कर दिया जाता है।
इसी तरह, राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने उच्च सदन में एक चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा किया। तन्खा ने खुलासा किया कि वर्तमान सत्र के दौरान उन्होंने लगभग 90 सवाल पूछे थे, लेकिन उन्हें 10 से भी कम के जवाब मिले। उन्होंने इसे प्रशासनिक चूक के बजाय एक "पैटर्न स्टेटमेंट" करार दिया और कहा कि यह लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही के अभाव और संस्थागत पतन का प्रतीक है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि वेस्टमिंस्टर शैली के लोकतंत्र में सवाल पूछना और उनके जवाब प्राप्त करना सरकार को जवाबदेह ठहराने का प्राथमिक तंत्र है। जब सवालों की स्वीकार्यता चयनात्मक हो जाती है, तो विधायिका की जांच करने की शक्ति समाप्त हो जाती है। यह बदलाव दर्शाता है कि कार्यपालिका अब पारदर्शिता के बजाय नियंत्रण को प्राथमिकता दे रही है, जो लोकतांत्रिक शासन के लिए घातक हो सकता है।
संसदीय प्रश्नों की व्यवस्थित अस्वीकृति एक विचारशील लोकतंत्र को केवल एक रबर-स्टैम्प सभा में बदल देती है, जिससे कार्यपालक जवाबदेही का मूल तत्व समाप्त हो जाता है।
यह विवाद केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने हाल ही में कहा कि डीएमके सांसद मथेश्वरन वी एस द्वारा NEET-UG 2026 पेपर लीक और युवा विरोध प्रदर्शनों के संबंध में पूछे गए तीन सेट सवालों को खारिज कर दिया गया। इन सवालों में छात्र कल्याण, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार और सरकार की रणनीति के बारे में जानकारी मांगी गई थी।
मनीष तिवारी ने संसदीय संस्कृति के गिरते स्तर पर भी दुख जताया। उन्होंने कहा कि 1980 के दशक के मध्य से तर्कपूर्ण बहस की जगह हंगामे और नारेबाजी ने ले ली है। उनके अनुसार, संसद अब कानूनों के निर्माण और सरकार की जवाबदेही तय करने वाला "पवित्र कक्ष" नहीं, बल्कि सत्ता हथियाने का एक "ग्लेडिएटर अखाड़ा" बनकर रह गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सरकार द्वारा किन विशिष्ट मुद्दों से बचने का आरोप लगाया गया है?
मुख्य मुद्दों में चीनी सीमा घुसपैठ, ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तानी आतंकवाद, रूसी तेल आयात और NEET-UG पेपर लीक विरोध प्रदर्शन शामिल हैं।
प्रश्न 2: सवालों को स्वीकार या अस्वीकार करने का कानूनी आधार क्या है?
यह प्रक्रिया लोकसभा के संचालन नियमों (नियम 41-44), अध्यक्ष के निर्देशों और स्थापित संसदीय परंपराओं पर आधारित होती है।