पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा प्रचारित 'सामान्यता' को एक दिखावा करार दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि केवल तिरंगा रैलियों और पर्यटन से वास्तविक शांति नहीं आ सकती जब तक कि नागरिकों में सुरक्षा और न्याय का भाव न हो।
- प्रशासन द्वारा तिरंगा रैलियों में कर्मचारियों के लिए अनिवार्य भागीदारी को 'दबावपूर्ण शासन' बताया गया।
- पर्यटन की भीड़ और सामान्यता के दावों के पीछे सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी और डर का माहौल।
- कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा और उनकी वापसी के लिए केवल औपचारिक आयोजनों के बजाय सुरक्षित वातावरण की आवश्यकता।
- युवा पीढ़ी (Gen Z और Gen Alpha) पर सामूहिक दंड और हिरासत की कार्रवाई का गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव।
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर एक गंभीर लेख लिखते हुए केंद्र सरकार के 'सामान्यता' के दावों को चुनौती दी है। उन्होंने अनंतनाग में सरकारी कर्मचारियों को 'तिरंगा रैली' में भाग लेने के लिए दिए गए प्रशासनिक आदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि जब देशभक्ति को प्रशासनिक बाध्यता बना दिया जाता है, तो वह वास्तविक उत्साह नहीं बल्कि एक 'कोरियोग्राफ्ड' प्रदर्शन बन जाता है।
मुफ्ती के अनुसार, अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से कश्मीर के लोग अत्यधिक सुरक्षा और प्रशासनिक दमन के बीच जी रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि घाटी में छापेमारी, जांच एजेंसियों की सक्रियता और संदिग्ध संबंधों के आधार पर सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी ने परिवारों को तबाह कर दिया है। हजारों लोगों को 'ओवरग्राउंड वर्कर्स' के आरोप में हिरासत में लिया गया, जिससे आम नागरिकों में भय व्याप्त है।
Why This Matters
BozokMedia का विश्लेषण दर्शाता है कि कश्मीर में 'सतही शांति' और 'गहरी शांति' के बीच एक बड़ा अंतर है। सरकार जहां पर्यटन के आंकड़ों को सफलता के रूप में पेश कर रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा अभी भी अनसुलझा है। यह विरोधाभास भविष्य में राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।
वास्तविक शांति तब आती है जब नागरिक कानून से डरने के बजाय उसमें सुरक्षित महसूस करें, न कि तब जब उन्हें प्रदर्शनों के लिए मजबूर किया जाए।
लेख में कश्मीरी पंडितों की दुखद स्थिति का भी उल्लेख है। मुफ्ती ने कहा कि 2019 के बाद भी समुदाय के 25 सदस्यों की हत्या हुई है, जो यह साबित करता है कि खतरा अभी टला नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि कश्मीरी पंडितों की वापसी केवल सरकारी समारोहों से नहीं, बल्कि एक ऐसे वातावरण से होगी जहां वे वास्तव में सुरक्षित महसूस करें।
सबसे चिंताजनक पहलू कश्मीर की नई पीढ़ी (Gen Z और Gen Alpha) का है। ये बच्चे 90 के दशक के संघर्ष के समय पैदा नहीं हुए थे, लेकिन आज वे अपने पिताओं और भाइयों को हिरासत में लिए जाते और घरों को ढहाते देख रहे हैं। मुफ्ती का तर्क है कि यह अनुभव सुलह पैदा नहीं करता, बल्कि 'जख्मी यादें' बनाता है जो केवल झंडे फहराने से नहीं मिटतीं।
अंत में, उन्होंने मांग की कि राज्य को एक आतंकवादी और एक आम नागरिक के बीच अंतर करना सीखना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कश्मीर को अब प्रदर्शनों की नहीं, बल्कि गरिमा, न्याय और संवाद के माध्यम से उपचार (Healing) की आवश्यकता है।
Frequently Asked Questions
1. महबूबा मुफ्ती ने तिरंगा रैली के आदेश पर क्या आपत्ति जताई?
उनका कहना है कि जब किसी सरकारी कार्यक्रम में भागीदारी अनिवार्य कर दी जाती है, तो वह देशभक्ति नहीं बल्कि प्रशासनिक दबाव बन जाता है।
2. लेख के अनुसार कश्मीर की नई पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
नई पीढ़ी अपने परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी और घरों के विध्वंस को देख रही है, जिससे उनके मन में व्यवस्था के प्रति डर और आक्रोश बढ़ रहा है।