केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों के लिए 'स्थायी राजनीतिक समाधान' का मसौदा तैयार करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन की घोषणा की है। पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली यह समिति दशकों पुराने गोरखा आंदोलन की मांगों को संवैधानिक दायरे में हल करने का प्रयास करेगी।
- पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है।
- यह समिति दार्जिलिंग, तराई और डुआर्स क्षेत्रों के लिए एक स्थायी राजनीतिक समाधान का मसौदा तैयार करेगी।
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट होने के कारण यह क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील है।
शनिवार, 22 अगस्त 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पहाड़ियों के विभिन्न हितधारकों के साथ सिलीगुड़ी में एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक के दौरान, गृह मंत्री ने दार्जिलिंग और उत्तर बंगाल के आसपास के क्षेत्रों के लोगों द्वारा मांगी जा रही "स्थायी राजनीतिक समाधान" की रूपरेखा और तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने के लिए एक विशेष समिति के गठन की घोषणा की।
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, इस समिति की अध्यक्षता पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और वर्तमान वार्ताकार पंकज कुमार सिंह करेंगे। बैठक में पश्चिम बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र की आबादी से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई, जिसमें उनकी पहचान, संवैधानिक मान्यता और स्थायी राजनीतिक समाधान की मांगें शामिल थीं। गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया कि भारत के संविधान के दायरे में जल्द ही एक स्थायी समाधान निकाला जाएगा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और स्वायत्तता की मांग
दार्जिलिंग पहाड़ियों के लोग पिछले कई दशकों से दार्जिलिंग, तराई और डुआर्स के क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग राज्य 'गोरखालैंड' बनाने की मांग कर रहे हैं। यह मांग इस आधार पर की जाती रही है कि यह क्षेत्र भाषाई और सांस्कृतिक रूप से पश्चिम बंगाल के शेष हिस्सों से पूरी तरह भिन्न है। इस मांग को लेकर 1980 के दशक के उत्तरार्ध से कई हिंसक आंदोलन और अनिश्चितकालीन बंद देखे गए हैं।
इससे पहले, इस क्षेत्र की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) और 2011 में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (GTA) जैसे क्षेत्रीय स्वायत्त निकायों का गठन किया गया था। हालांकि, ये निकाय स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहे। वर्ष 2017 में इस क्षेत्र ने 100 दिनों से अधिक का हिंसक बंद देखा था, जिसमें 11 लोगों की जान चली गई थी।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि दार्जिलिंग क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पश्चिम में नेपाल, पूर्व में भूटान और दक्षिण में बांग्लादेश की सीमाओं के बेहद करीब है। इसके अलावा, यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी "चिकन नेक" के पास स्थित है, जो मुख्य भूमि भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला एकमात्र जमीनी मार्ग है। इसलिए, इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।
"गोरखा मुद्दे का समाधान केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि भारत के अत्यधिक संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर को सुरक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यता है।"
वर्तमान में, केंद्र और पश्चिम बंगाल दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार होने के कारण इस दिशा में एक निर्णायक कदम उठाने का यह सबसे उपयुक्त अवसर माना जा रहा है। हालांकि, पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों के लोग राज्य के किसी भी प्रकार के विभाजन का कड़ा विरोध करते रहे हैं, जिससे यह मुद्दा बेहद संवेदनशील हो जाता है।
| पहलू | डीजीएचसी (1988) | जीटीए (2011) | प्रस्तावित समाधान (2026) |
|---|---|---|---|
| शक्तियां | सीमित प्रशासनिक अधिकार | अर्ध-स्वायत्त क्षेत्रीय निकाय | संवैधानिक और स्थायी राजनीतिक समाधान |
| स्थायित्व | विफल रहा | असंतोषजनक साबित हुआ | दीर्घकालिक शांति और सुरक्षा का लक्ष्य |
| मुख्य फोकस | स्थानीय विकास | सीमित स्वशासन | पहचान और संवैधानिक मान्यता |
Frequently Asked Questions
1. 'स्थायी राजनीतिक समाधान' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ दार्जिलिंग पहाड़ियों के लोगों की स्वशासन, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मान्यता की मांगों को भारतीय संविधान के दायरे में रहते हुए स्थायी रूप से हल करना है।
2. इस नई समिति की अध्यक्षता कौन कर रहा है?
इस समिति की अध्यक्षता भारत के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और वर्तमान सरकारी वार्ताकार पंकज कुमार सिंह कर रहे हैं।