कांग्रेस नेता मल्लीकार्जुन खुर्गे ने कहा कि केंद्र सरकार 8.2 लाख खाली सरकारी पदों को बरकरार रख कर आरक्षण के मूल अधिकारों को वैध रूप से घटा रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण और अनुबंधित रोजगार का बढ़ना इस प्रक्रिया को तेज़ कर रहा है।

  • 8.24 लाख केंद्रीय पद 2024 में खाली
  • पीएसयू में 5.1 लाख स्थायी पद हटाए
  • अनुबंधित कर्मचारियों का प्रतिशत 19% से 49% तक बढ़ा

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लीकार्जुन खुर्गे ने सोमवार को सामाजिक न्याय के नाम पर सरकार द्वारा आरक्षण को “पीछे के दरवाज़े” से खत्म करने के आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि 2015 में 4.21 लाख खाली पदों की संख्या 2024 में 8.24 लाख तक पहुँच गई है, जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के उम्मीदवारों के रोजगार के अवसर घट रहे हैं।

खुर्गे ने रेल, रक्षा और गृह मंत्रालय में क्रमशः 2.40, 2.41 और 1.10 लाख खाली पदों की विस्तृत सूची सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर साझा की। इन ख़ाली पदों को न भरा जाना, आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों से बाहर रखता है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बेचने से स्थायी नौकरियों की संख्या घटती है।

साथ ही उन्होंने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र में 5.1 लाख स्थायी पदों को समाप्त कर दिया गया है, जबकि अनुबंधित कर्मचारियों का प्रतिशत 19% से बढ़कर 49% हो गया है। यह परिवर्तन न केवल रोजगार को अस्थायी बना रहा है, बल्कि आरक्षण के तहत मिलने वाले सामाजिक सुरक्षा तंत्र को भी कमजोर कर रहा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान ने 1950 में ही आरक्षण को सामाजिक समानता और आर्थिक न्याय का मुख्य स्तम्भ बनाया। पिछले दशकों में विभिन्न सरकारों ने आरक्षण को विस्तारित किया, लेकिन 1990 के दशक के बाद आर्थिक उदारीकरण ने सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार को घटाया, जिससे आरक्षण के प्रभाव में कमी आई।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that systematic vacancy creation and the rise of contractual hiring can erode constitutional safeguards without any formal amendment, setting a precedent for other democracies grappling with affirmative‑action policies.

“खाली पदों को जानबूझकर बरकरार रखकर आरक्षण को निष्प्रभावी बनाना, लोकतांत्रिक संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध एक रणनीतिक कदम है।” – डॉ. अनीता सिंह, संवैधानिक विशेषज्ञ
Did You Know?: 1992 में भारत में पहली बार सार्वजनिक क्षेत्र में निजीकरण की नीति का औपचारिक रूप से अपनाया गया था, जिससे आज तक कई सरकारी नौकरी के अवसर घटे हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या खाली पदों को भरना आरक्षण के प्रभाव को पुनः स्थापित कर सकता है?

उत्तर: हाँ, यदि इन पदों को वास्तविक रूप से भरा जाए और अनुबंधित कर्मचारियों को स्थायी बनायें तो आरक्षण का लक्ष्य पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 2: सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण का आरक्षण पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर: निजीकरण से स्थायी पदों की संख्या घटती है, जिससे आरक्षित वर्ग के लिए सुरक्षित नौकरी के अवसर कम होते हैं, और सामाजिक असमानता बढ़ सकती है।