अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश को मंजूरी दे दी है जो मेल-इन वोटिंग (डाक द्वारा मतदान) को प्रतिबंधित करता है, जिससे आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
- अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप को मेल-इन वोटिंग प्रतिबंधित करने के आदेश को आगे बढ़ाने की अनुमति दी।
- यह निर्णय 6-3 के बहुमत से लिया गया, जिसमें तीन उदारवादी न्यायाधीशों ने असहमति जताई।
- 23 राज्यों के डेमोक्रेटिक अधिकारियों का दावा है कि इससे चुनावों में अराजकता और पक्षपातपूर्ण दुरुपयोग हो सकता है।
वॉशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को एक बड़ी कानूनी जीत सौंपी है। अदालत ने ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश को हरी झंडी दे दी है, जिसका उद्देश्य मेल-इन वोटिंग (डाक द्वारा मतदान) को सीमित करना है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव (midterm elections) बेहद करीब हैं। हालांकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि चुनाव से पहले प्रशासन इन बदलावों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू कर पाएगा।
इस विवाद की जड़ मार्च में हस्ताक्षरित एक कार्यकारी आदेश है। इस आदेश के तहत प्रशासन को पात्र मतदाताओं की एक सूची तैयार करने और यूएस पोस्टल सर्विस (USPS) को निर्देश देने की शक्ति मिलती है कि वे केवल उन्हीं लोगों को मतपत्र भेजें जो इस आधिकारिक सूची में शामिल हैं। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि यह कदम चुनाव की शुचिता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पहुंच पर एक बड़ा प्रहार हो सकता है। मेल-इन बैलेट्स के वितरण को सीमित करके, प्रशासन अनजाने में या जानबूझकर उन हजारों मतदाताओं को मतदान से वंचित कर सकता है जो इस पद्धति पर निर्भर हैं। चुनावों से ठीक पहले ऐसे बदलावों से मतदाताओं के बीच भ्रम और अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।
दूसरी ओर, 23 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के डेमोक्रेटिक अधिकारियों ने तर्क दिया है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार चुनाव चलाने की शक्ति राज्यों और कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास। उन्होंने चेतावनी दी कि इतने कम समय में किए गए बदलावों के परिणाम 'अत्यंत गंभीर' हो सकते हैं।
कार्यकारी आदेशों और राज्य-स्तरीय चुनाव प्रशासन के बीच का यह टकराव एक संवैधानिक तनाव पैदा करता है, जिसे केवल सर्वोच्च न्यायालय ही सुलझा सकता है, लेकिन इस फैसले का समय कार्यान्वयन को अनिश्चित बनाता है।
ऐतिहासिक रूप से, राष्ट्रपति ट्रंप ने मेल-इन वोटिंग को धोखाधड़ी का केंद्र बताया है, जबकि साक्ष्य इसके विपरीत रहे हैं। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, मेल-इन बैलेट्स में धोखाधड़ी के मामले नगण्य हैं—प्रति 1 करोड़ मतपत्रों में केवल चार मामले पाए गए।
| दृष्टिकोण | ट्रंप प्रशासन का तर्क | डेमोक्रेटिक राज्यों का तर्क |
|---|---|---|
| मुख्य लक्ष्य | चुनाव अखंडता को बढ़ावा देना | मतदाता पहुंच की रक्षा करना |
| कानूनी आधार | चुनाव सुरक्षित करने का कार्यकारी अधिकार | संवैधानिक राज्य/कांग्रेसी शक्ति |
| संभावित जोखिम | व्यापक मतदाता धोखाधड़ी | पक्षपातपूर्ण दुरुपयोग और अराजकता |
इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन SAVE अमेरिका एक्ट जैसे विवादास्पद कानूनों को पारित कराने का दबाव बना रहा है, जिसमें मतदान के लिए नागरिकता के प्रमाण की अनिवार्यता शामिल है। हालांकि, गैर-नागरिकों द्वारा मतदान करना एक दुर्लभ घटना है और यह एक गंभीर अपराध (felony) की श्रेणी में आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या इस फैसले से मेल-इन वोटिंग पूरी तरह बंद हो जाएगी?
नहीं, यह केवल प्रशासन को पात्र मतदाता सूची के आधार पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है, मतदान को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करता।
प्रश्न 2: कौन से राज्य इस आदेश का विरोध कर रहे हैं?
23 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के डेमोक्रेटिक अधिकारियों ने इस आदेश को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी है।