मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महायुति के सहयोगी दलों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक कर सरकारी निगमों में नियुक्तियों के गतिरोध को दूर किया है। इस बैठक में विधायकों की संख्या के आधार पर शक्ति विभाजन का फॉर्मूला तय किया गया, जिससे नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों पर विराम लग गया है।
- सरकारी निगमों के बंटवारे के लिए विधायकों की संख्या को आधार बनाया गया।
- निगमों को ए, बी और सी श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा।
- डीपीडीसी फंड और नियुक्तियों के लिए 60-30-10 का नया अनुपात तय हुआ।
- नेतृत्व परिवर्तन की सभी अफवाहों को आधिकारिक तौर पर खारिज किया गया।
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ समय से महायुति सरकार के भीतर सरकारी निगमों में नियुक्तियों को लेकर खींचतान चल रही थी। इस तनाव को समाप्त करने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने सरकारी आवास 'वर्षा' पर एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। देर रात डिनर के दौरान हुई इस 'डिनर डिप्लोमेसी' में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), एकनाथ शिंदे की शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शीर्ष नेताओं ने हिस्सा लिया।
बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु राज्य के विभिन्न सरकारी निगमों में पदों का वितरण था। विवाद को सुलझाने के लिए एक स्पष्ट फॉर्मूला तैयार किया गया है, जिसके तहत निगमों में हिस्सेदारी का निर्धारण संबंधित दल के पास मौजूद विधायकों की संख्या के आधार पर किया जाएगा। चूंकि महायुति में बीजेपी के पास सबसे अधिक विधायक हैं, इसलिए निगमों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी बीजेपी की होगी, जिसके बाद शिवसेना और एनसीपी का स्थान आएगा।
प्रशासनिक दक्षता के लिए सरकारी निगमों को तीन श्रेणियों—ए, बी और सी—में बांटा जाएगा। 'ए' श्रेणी में राज्य के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली निगम शामिल होंगे। सरकार ने लक्ष्य रखा है कि अगले एक महीने के भीतर सभी लंबित नियुक्तियों और विवादों का समाधान कर लिया जाए। इसके लिए हर मंगलवार को समीक्षा बैठक आयोजित की जाएगी।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह कदम केवल प्रशासनिक नियुक्तियों के बारे में नहीं है, बल्कि यह गठबंधन की स्थिरता का संकेत है। जब भी निगमों और बोर्डों के बंटवारे में देरी होती है, तो सहयोगी दलों के बीच असंतोष बढ़ता है, जिससे सरकार की छवि कमजोर होती है। इस फॉर्मूले के जरिए फडणवीस ने यह सुनिश्चित किया है कि सत्ता का संतुलन बना रहे और किसी भी दल को उपेक्षित महसूस न हो।
"विधायकों की संख्या को आधार बनाना एक लोकतांत्रिक और पारदर्शी तरीका है, जो गठबंधन सरकारों में आंतरिक कलह को रोकने का सबसे प्रभावी साधन होता है।"
बैठक में जिला योजना विकास समिति (DPDC) के मुद्दों पर भी सहमति बनी। नए नियमों के अनुसार, सत्ताधारी दलों के विधायक अपने क्षेत्रों में 60% सदस्यों की नियुक्ति और फंड पर नियंत्रण रखेंगे, जबकि संबंधित पालक मंत्री को 30% और छोटे सहयोगियों को 10% हिस्सेदारी मिलेगी।
इस बैठक के बाद नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं पर भी विराम लग गया। बीजेपी नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने स्पष्ट किया कि विपक्ष केवल अफवाहें फैला रहा है और महायुति के पास 235 विधायकों का मजबूत समर्थन है। बैठक में गिरीश महाजन, एकनाथ शिंदे, उदय सामंत, और छगन भुजबल जैसे दिग्गज नेता मौजूद रहे।
Frequently Asked Questions
1. निगमों के बंटवारे का आधार क्या है?
निगमों में पदों का वितरण महायुति के घटक दलों के पास मौजूद विधायकों की संख्या के अनुपात में किया जाएगा।
2. डीपीडीसी (DPDC) फंड का नया वितरण क्या है?
क्षेत्रीय विधायक को 60%, पालक मंत्री को 30% और छोटे सहयोगियों को 10% हिस्सेदारी मिलेगी।