तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित कर्रेगुत्तलू की पहाड़ियों में दशकों के माओवादी आतंक के बाद अब शांति और विकास की किरण दिखाई दे रही है। सड़कों और सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने सात बचे हुए परिवारों के जीवन में नई उम्मीद जगाई है।
- कर्रेगुत्तलू की पहाड़ियों में दशकों के बाद माओवादी प्रभाव में भारी कमी आई है।
- सुरक्षा बलों ने लैंडमाइन वाले क्षेत्रों में 33.5 किमी लंबी सड़क का निर्माण किया है।
- केवल सात परिवार अब भी इन दुर्गम पहाड़ियों में निवास कर रहे हैं।
- राज्य सरकार अब बिजली और बुनियादी ढांचे के माध्यम से विकास लाने की योजना बना रही है।
तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित कर्रेगुत्तलू की पहाड़ियों में दशकों से व्याप्त भय का साया अब धीरे-धीरे छंट रहा है। एक समय में यह क्षेत्र माओवादी उग्रवादियों का अभेद्य किला हुआ करता था, जहाँ सुरक्षा बलों का पहुँचना मौत को दावत देने जैसा था। लेकिन आज, बदलती तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है।
मुलुगु जिले के पमुनूर गाँव की निवासी माधवी कामिनी की कहानी इस बदलाव का जीवंत उदाहरण है। कामिनी बताती हैं कि कैसे सालों तक वे माओवादियों और पुलिस के बीच पिसती रहीं। माओवादी उनके घरों में आकर चेतावनी देते थे कि वे पुलिस को कुछ न बताएं, जबकि पुलिस उन्हें संदिग्ध मानकर गिरफ्तार कर लेती थी। आज, कामिनी के घर के बाहर राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहा है, जो उस दौर की याद दिलाता है जब यहाँ तिरंगा फहराना भी प्रतिबंधित था।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि कर्रेगुत्तलू जैसे क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास केवल सड़क निर्माण नहीं है, बल्कि यह राज्य की संप्रभुता की पुनः स्थापना है। जब तक इन दुर्गम क्षेत्रों में बिजली, सड़क और संचार नहीं पहुँचेगा, तब तक उग्रवाद को जड़ से मिटाना कठिन होगा।
'कर्रेगुत्तलू अब माओवादियों का सुरक्षित ठिकाना नहीं रहा; ऑपरेशन कगार के बाद यहाँ सुरक्षा बलों का वर्चस्व स्थापित हो चुका है।' - पुलिस अधिकारी का विश्लेषण।
सुरक्षा बलों और जिला प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से 'ऑपरेशन कगार' के तहत एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण मिशन पूरा किया गया। लगभग छह महीनों तक चले इस अभियान में लैंडमाइन से भरे इलाकों में 33.5 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई गई, जो मुरूमुरु से तडापला गाँव तक जाती है। यह सड़क न केवल आवागमन सुगम बनाएगी, बल्कि विकास के नए द्वार भी खोलेगी।
हालांकि, इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं। जहाँ एक ओर विकास की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के विश्वास को जीतना और जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। कई गाँव अब खाली हो चुके हैं और लोग या तो मैदानी इलाकों में बस गए हैं या छत्तीसगढ़ चले गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. कर्रेगुत्तलू की पहाड़ियों में वर्तमान स्थिति क्या है?
वर्तमान में यह क्षेत्र माओवाद मुक्त होने की ओर अग्रसर है और यहाँ सुरक्षा बलों की उपस्थिति बढ़ रही है।
2. विकास कार्यों में मुख्य बाधा क्या थी?
लैंडमाइन्स (बारूदी सुरंगें) और अत्यधिक घना जंगल सबसे बड़ी बाधाएं थीं।