पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने कहा कि युवा पीढ़ी (Gen Z) का सरकार की आलोचना करने का साहस भारत में लोकतांत्रिक प्रगति का एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने न्यायपालिका में सुधार और राज्य की शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने की आवश्यकता पर बल दिया।

  • न्यायमूर्ति मुरलीधर ने 'Gen Z' के विद्रोही स्वभाव को लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत बताया।
  • उन्होंने सरकार द्वारा कानून के 'हथियारीकरण' और आलोचना को दबाने की प्रवृत्ति की आलोचना की।
  • न्यायपालिका में सुधार और लंबित मामलों के निपटारे के लिए त्वरित कार्रवाई की मांग की।
  • कोलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी और कार्यकारी हस्तक्षेप पर चिंता जताई।

ओडिशा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने हाल ही में 'मेरा भारत 2047 का दृष्टिकोण' विषय पर आयोजित डी.एस. बोरकर मेमोरियल लेक्चर के दौरान महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी, जिसे अक्सर 'Gen Z' कहा जाता है, सरकार के प्रति सम्मान की कमी नहीं दिखा रही है, बल्कि यह उनके स्वतंत्र चिंतन का परिणाम है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रगति का एक निश्चित संकेत बताया।

न्यायमूर्ति मुरलीधर ने विशेष रूप से 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्दों के माध्यम से राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की कोशिशों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि युवाओं का राजनीतिक रैलियों या सरकारी प्रचार से प्रभावित न होना और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए खड़े होना यह सुनिश्चित करता है कि भारत का लोकतंत्र जीवित रहेगा।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि न्यायमूर्ति मुरलीधर का बयान भारत के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में एक गहरे बदलाव की ओर इशारा करता है। जब युवा पीढ़ी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाती है, तो यह केवल विरोध नहीं है, बल्कि नागरिक भागीदारी का एक उच्च स्तर है। यह बयान उस समय आया है जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध को लेकर देश में बहस तेज है।

'आज की न्यायपालिका को 2047 की बेहतर सेवा करने के लिए राज्य की अत्यधिक शक्तियों के खिलाफ शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी।'

न्यायमूर्ति ने चेतावनी दी कि यदि सरकार आलोचना करने वालों, कार्टूनिस्टों या स्टैंड-अप कॉमेडियन को निशाना बनाना जारी रखती है, तो यह भविष्य के भारत के लिए हानिकारक होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि शांतिपूर्ण विरोध को 'साजिश' के रूप में लेबल करना बंद किया जाना चाहिए।

न्यायपालिका और कोलेजियम प्रणाली में चुनौतियां

न्यायमूर्ति मुरलीधर ने न्यायिक नियुक्तियों की कोलेजियम प्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 1993 में इस प्रणाली को अपनाने का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों को चुनना था, लेकिन पिछले 12 वर्षों में इसमें कार्यपालिका का हस्तक्षेप और पारदर्शिता की कमी देखी गई है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने न्यायपालिका में लंबित करोड़ों मामलों पर भी बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें से कई मामले 'मृत' हैं—यानी ऐसी स्थिति जिनमें पक्षकार जीवित नहीं हैं या कानून बदल चुका है। उन्होंने छोटे अपराधों, जैसे अवैध शराब या लकड़ी रखने के लिए जनजातीय समुदायों पर दर्ज किए गए मामलों को भी न्यायिक बोझ का कारण बताया।

Did You Know?: भारत में न्यायिक लंबितता का एक बड़ा हिस्सा उन मामलों का है जो कानूनी रूप से अब प्रासंगिक ही नहीं रहे।

Frequently Asked Questions

1. न्यायमूर्ति मुरलीधर ने 'Gen Z' के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि युवाओं का निर्भीक और सवाल पूछने वाला स्वभाव लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है।

2. उन्होंने कोलेजियम प्रणाली की क्या आलोचना की?
उन्होंने इसमें पारदर्शिता की कमी, अस्पष्ट मानदंडों और कार्यपालिका के बढ़ते हस्तक्षेप की आलोचना की।