एक राष्ट्रीय ओबीसी सम्मेलन में केंद्र सरकार से जनगणना में प्रत्येक जाति के लिए एक विशिष्ट कोड और अलग कॉलम बनाने की मांग की गई है। नेताओं ने चेतावनी दी है कि वैज्ञानिक कोडिंग के बिना जनगणना पर किया जाने वाला खर्च व्यर्थ होगा।

  • ओबीसी समूहों ने जनगणना में हर जाति के लिए एक 'यूनिक कोड' की मांग की है।
  • नेताओं ने चेतावनी दी कि बिना वैज्ञानिक कोडिंग के जनगणना पर खर्च होने वाला ₹12,800 करोड़ बर्बाद हो जाएगा।
  • सम्मेलन में ओबीसी और सामान्य श्रेणी के लिए अलग-अलग कॉलम बनाने का प्रस्ताव दिया गया।

नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय ओबीसी सम्मेलन में, सामाजिक न्याय के समर्थकों ने केंद्र सरकार से आगामी जनगणना प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव करने की मांग की है। सम्मेलन का नेतृत्व पूर्व आईएएस अधिकारी और बैकवर्ड क्लासेस इंटेलेक्चुअल फोरम के अध्यक्ष टी. चिरंजीवी और अखिल भारतीय ओबीसी छात्र संघ के अध्यक्ष जी. किरण कुमार ने किया।

वक्ताओं का तर्क है कि यदि प्रत्येक जाति को एक विशिष्ट और वैज्ञानिक कोड नहीं दिया गया, तो जनगणना का डेटा अविश्वसनीय और उपयोगिताहीन होगा। सम्मेलन में यह मांग उठाई गई कि जिस तरह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए जनगणना प्रश्नावली में अलग कॉलम दिए जाते हैं, उसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामान्य श्रेणी के लिए भी अलग-अलग कॉलम होने चाहिए।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जातिगत जनगणना का मुद्दा भारत की राजनीति और सामाजिक नीति के केंद्र में है। यदि सरकार वैज्ञानिक कोडिंग के बिना जनगणना करती है, तो इससे भविष्य की आरक्षण नीतियों और कल्याणकारी योजनाओं के निर्धारण में गंभीर त्रुटियां हो सकती हैं।

बिना वैज्ञानिक कोडिंग के जनगणना करना केवल एक औपचारिकता होगी, जो सार्वजनिक धन की बर्बादी के समान है।

दिमख (DMK) नेता और राज्यसभा सांसद पी. विल्सन और प्रसिद्ध प्रोफेसर योगेंद्र यादव ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने चेतावनी दी कि केंद्र सरकार जनगणना पर लगभग ₹12,800 करोड़ खर्च कर रही है, जो पूरी तरह से व्यर्थ जा सकता है यदि डेटा संग्रह की प्रक्रिया दोषपूर्ण रही। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि इन मांगों को अनसुना किया गया, तो देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जा सकता है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी जनगणना के प्रस्तावित खुले प्रारूप (open-ended format) पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि भारत की भाषाई और क्षेत्रीय विविधता के कारण एक ही जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों या उप-जातियों से जाना जाता है। बिना एक मानक कोडिंग प्रणाली के, डेटा का एकीकरण करना लगभग असंभव होगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में जातिगत डेटा का संग्रह हमेशा से एक संवेदनशील और जटिल विषय रहा है। स्वतंत्रता के बाद से, जनगणना के माध्यम से सामाजिक संरचना को समझने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन जातिगत विवरणों की सटीकता और उनका राजनीतिक उपयोग हमेशा बहस का विषय रहा है।

Did You Know?: भारत में जनगणना की प्रक्रिया एक अत्यंत विशाल कार्य है, जिसमें करोड़ों लोगों की पहचान और वर्गीकरण किया जाता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: ओबीसी समूह क्या मांग कर रहे हैं?
उत्तर: वे जनगणना में प्रत्येक जाति के लिए एक विशिष्ट कोड और ओबीसी के लिए अलग कॉलम की मांग कर रहे हैं।

प्रश्न 2: वैज्ञानिक कोडिंग क्यों आवश्यक है?
उत्तर: ताकि विभिन्न क्षेत्रों में एक ही जाति के अलग-अलग नामों के कारण होने वाली भ्रम की स्थिति से बचा जा सके और सटीक डेटा प्राप्त हो सके।