ओणम उत्सव के समापन समारोह में वंदे मातरम के छह छंदों के गायन ने केरल की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है। इस घटना ने राज्य सरकार और वामपंथी दलों के बीच वैचारिक मतभेदों को फिर से उजागर कर दिया है।

  • ओणम पेजेंट्री के दौरान वंदे मातरम के छह छंद गाए गए।
  • उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने समारोह का शुभारंभ किया।
  • CPI(M) ने इसे 'हिंदुत्व एजेंडा' का हिस्सा बताया है।
  • राज्य सरकार ने इसे संवैधानिक प्रोटोकॉल का पालन करार दिया है।

केरल में ओणम की छुट्टियों के समापन के साथ ही वंदे मातरम को लेकर राजनीतिक विवाद एक बार फिर केंद्र में आ गया है। रविवार शाम को लोक भवन के सामने आयोजित केरल सरकार द्वारा प्रायोजित ओणम सप्ताह पेजेंट्री के समापन पर एक गाना बजाने वाले समूह (choir) ने इस गीत के सभी छह छंदों का गायन किया। इस कार्यक्रम का शुभारंभ उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने किया था।

इस अवसर पर केरल के राज्यपाल राजेंद्र अरलेकर, मुख्यमंत्री वी.डी. सथीसन और पर्यटन मंत्री पी.सी. विष्णुनाथ भी मंच पर मौजूद थे। यह घटना इसलिए चर्चा में है क्योंकि 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान राज्य सरकार ने वंदे मातरम को पूर्ण रूप से न गाने का निर्णय लिया था। अब इस निर्णय से पलटते हुए पूर्ण संस्करण का गायन राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this is not merely a matter of musical preference but a deep-rooted ideological clash. In a state like Kerala, where the political landscape is sharply divided between the LDF (Left Democratic Front) and UDF (United Democratic Front), the use of national symbols often becomes a proxy for the larger battle between secularism and Hindutva ideology.

CPI(M) राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस RSS के 'सभ्यतावादी राजनीति' के प्रोजेक्ट में एक सहायक की भूमिका निभा रही है। उन्होंने दावा किया कि यह विचारधारा अल्पसंख्यकों और समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों को निम्न स्तर पर धकेलने का प्रयास है। गोविंदन ने 1937 की कांग्रेस वर्किंग कमेटी के उस निर्णय की याद दिलाई जिसमें धार्मिक प्रतीकों के कारण गीत की केवल पहली दो पंक्तियों को गाने का सुझाव दिया गया था।

"प्रोटोकॉल का उपयोग अक्सर वैचारिक झुकाव को छिपाने के लिए एक सुविधाजनक ढाल के रूप में किया जाता है।"

दूसरी ओर, स्थानीय स्वशासन मंत्री के.एम. शाजी ने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम का प्रोटोकॉल उपराष्ट्रपति कार्यालय द्वारा निर्धारित किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकार के पास राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति जैसे उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा निर्धारित आधिकारिक शिष्टाचार को बदलने का अधिकार नहीं है। पर्यटन मंत्री विष्णुनाथ ने भी इसी बात का समर्थन किया।

पूर्व शिक्षा मंत्री और CPI(M) सदस्य वी. शिवनकुट्टी ने फेसबुक पर तंज कसते हुए कहा कि प्रोटोकॉल केवल एक बहाना है जिसके जरिए UDF सरकार RSS के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने इसे 'दंड घुमाने और जूते चमकाने' की राजनीति करार दिया।

क्या आप जानते हैं?: वंदे मातरम मूल रूप से बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित एक उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा था, जिसे बाद में भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: विवाद का मुख्य कारण क्या है?
मुख्य विवाद वंदे मातरम के पूर्ण छह छंदों के गायन को लेकर है, जिसे CPI(M) हिंदुत्व एजेंडा के रूप में देख रहा है।

प्रश्न 2: राज्य सरकार का इस पर क्या तर्क है?
सरकार का कहना है कि उपराष्ट्रपति की उपस्थिति के कारण संवैधानिक प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य था।