गोवा सरकार द्वारा प्रस्तावित धर्म परिवर्तन विरोधी विधेयक को राजनीतिक दलों और कैथोलिक संगठनों के कड़े विरोध के बाद फिलहाल रोक दिया गया है। इस कानून के प्रावधानों और इसके संभावित सामाजिक प्रभावों पर एक गहन नजर।

  • गोवा कैबिनेट ने 'गोवा धर्म परिवर्तन निषेध विधेयक 2026' को मंजूरी दी थी, लेकिन भारी विरोध के कारण इसे विधानसभा में पेश नहीं किया गया।
  • विधेयक में जबरन धर्म परिवर्तन के लिए आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये तक के मुआवजे का प्रावधान था।
  • कैथोलिक संगठनों और विपक्षी विधायकों ने इसे संवैधानिक स्वतंत्रता पर हमला और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा बताया है।

गोवा की राजनीति में उस समय हड़कंप मच गया जब राज्य कैबिनेट ने 'गोवा धर्म परिवर्तन निषेध विधेयक, 2026' को मंजूरी दी। इस विधेयक का उद्देश्य उन धर्म परिवर्तनों को रोकना था जो बल, धमकी, प्रलोभन या धोखाधड़ी के माध्यम से किए जाते हैं। हालांकि, सोमवार सुबह मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के साथ हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि इस विधेयक को वर्तमान मानसून सत्र में पेश नहीं किया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि इस विरोध में केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी भाजपा के कुछ विधायक भी शामिल थे।

विधेयक के कठोर प्रावधान

प्रस्तावित ड्राफ्ट के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति बल या प्रलोभन के माध्यम से धर्म परिवर्तन कराता पाया जाता है, तो उसे आजीवन कारावास और न्यूनतम 50,000 रुपये के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, पीड़ितों के लिए 5 लाख रुपये तक के मुआवजे का प्रावधान था। विधेयक में यह भी कहा गया था कि यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया है, तो उसे शून्य (void) घोषित कर दिया जाएगा।

एक और विवादास्पद प्रावधान यह था कि धर्म बदलने के इच्छुक व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित घोषणा देनी होगी। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि परिवर्तन पूरी तरह से स्वैच्छिक है। धार्मिक गुरुओं, जैसे पादरियों, मौलवियों या कर्मकांडियों के लिए 3 से 10 साल तक की जेल का प्रावधान था।

क्यों उठ रहे हैं विरोध के स्वर?

काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस एंड पीस और कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने इस विधेयक को 'संवैधानिक स्वतंत्रता' पर प्रहार बताया है। उनका तर्क है कि गोवा में जबरन धर्म परिवर्तन का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, फिर भी ऐसे कानून लाना राज्य की पारंपरिक सद्भावना को नष्ट कर सकता है।

"यह कानून आपसी विश्वास को संदेह में और सामाजिक सद्भाव को निगरानी और डर में बदलने का जोखिम उठाता है।"

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि गोवा की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान (Goemchi Asmitai) इसे अन्य भारतीय राज्यों से अलग बनाती है। ऐसे में अन्य भाजपा शासित राज्यों के कानूनों की नकल करना गोवा के सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक हो सकता है। यह कदम 2027 के चुनावों से पहले ध्रुवीकरण की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

विपक्ष के विधायक कार्लोस अल्वेरेस फेरेरा और विजय सरदेसाई ने स्पष्ट किया है कि बिना किसी ठोस मामले के ऐसा कानून लाना केवल राजनीतिक लाभ के लिए है। उनका मानना है कि यह कानून केवल अल्पसंख्यकों को लक्षित करेगा और निजी धार्मिक विकल्पों में हस्तक्षेप करेगा।

क्या आप जानते हैं?: गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुर्तगाली शासन के प्रभाव के कारण एक बहुत बड़ा ईसाई समुदाय और एक अनूठी मिश्रित संस्कृति मौजूद है।

Frequently Asked Questions

1. क्या यह विधेयक अब पूरी तरह रद्द हो गया है?
नहीं, इसे वर्तमान सत्र में पेश नहीं किया गया है, लेकिन भविष्य में सरकार इस पर विचार कर सकती है।

2. इस विधेयक में सजा का क्या प्रावधान था?
इसमें न्यूनतम 3 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान था।