राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया अमेरिका और ब्रिटेन दौरों ने एक नए वैश्विक विवाद को जन्म दे दिया है। न्यूयॉर्क में धार्मिक नेताओं ने धोखे से बुलाए जाने का आरोप लगाया है, वहीं अमेरिकी सांसद रो खन्ना के नेतृत्व में 90 नेताओं ने संघ से दूरी बनाने का संकल्प लिया है।
- न्यूयॉर्क कार्यक्रम में शामिल हुए धार्मिक नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें धोखे से आमंत्रित किया गया था।
- अमेरिकी सांसद रो खन्ना समेत 90 नेताओं ने आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों से चंदा न लेने की घोषणा की।
- ब्रिटेन में मोहन भागवत के दौरे पर संसद में स्पष्टीकरण देना पड़ा, जबकि घरेलू स्तर पर हिंदुत्व की परिभाषा को लेकर मांग उठी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के हालिया अंतरराष्ट्रीय दौरों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर तब बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब वहां मौजूद कुछ धार्मिक नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें धोखे से इस कार्यक्रम में बुलाया गया था। इन नेताओं का कहना था कि उन्हें कार्यक्रम के वास्तविक एजेंडे और आरएसएस प्रमुख की उपस्थिति के बारे में पहले से स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी, जिससे वे असहज स्थिति में आ गए।
इस बीच, अमेरिका में राजनीतिक स्तर पर भी आरएसएस के खिलाफ माहौल गरमा गया है। भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद रो खन्ना के नेतृत्व में लगभग 90 अमेरिकी नेताओं ने एक बड़ा ऐलान किया है। इन नेताओं ने कसम खाई है कि वे आरएसएस या उससे जुड़े किसी भी संगठन से किसी भी प्रकार का चंदा या वित्तीय सहायता स्वीकार नहीं करेंगे। इसे अमेरिकी राजनीति में हिंदुत्ववादी संगठनों के खिलाफ एक बड़े अभियान के रूप में देखा जा रहा है, जिससे प्रवासी भारतीयों के बीच भी वैचारिक विभाजन गहरा गया है।
दूसरी ओर, मोहन भागवत के ब्रिटेन दौरे को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज रही। हालांकि वहां के स्थानीय हिंदू संगठनों ने उनका भव्य स्वागत किया, लेकिन ब्रिटिश संसद में उनके दौरे को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद ब्रिटिश सरकार को संसद में आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट करना पड़ा कि मोहन भागवत का यह दौरा पूरी तरह से देश के स्थापित आव्रजन (इमिग्रेशन) नियमों के अनुकूल था और इसमें किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया गया था।
Why This Matters
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय राजनीति का वैश्वीकरण अब प्रवासी भारतीयों के बीच गहरे वैचारिक मतभेद पैदा कर रहा है। आरएसएस के वैश्विक संपर्क अभियानों और पश्चिमी देशों के प्रगतिशील राजनीतिक समूहों के बीच बढ़ता टकराव यह दर्शाता है कि आने वाले समय में सांस्कृतिक कूटनीति की राह आसान नहीं होगी। यह विवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सॉफ्ट पावर और विभिन्न संगठनों की वैश्विक स्वीकार्यता को भी प्रभावित कर सकता है।
इस अंतरराष्ट्रीय विवाद के बीच भारत में भी घरेलू राजनीति गरमा गई है। स्वामी यतींद्रानंद गिरि ने एक बड़ा बयान देते हुए आरएसएस से मांग की है कि वह 'हिंदुत्व' की अपनी परिभाषा को पूरी तरह से स्पष्ट करे। इसके साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को देश की पहली पसंद बताते हुए भविष्य के नेतृत्व को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिससे संघ और भाजपा के आंतरिक समीकरणों पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
"वैश्विक मंच पर आरएसएस के कार्यक्रमों का विरोध यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग समूह अब भारतीय सांस्कृतिक संगठनों की गतिविधियों पर बहुत बारीक नजर रख रहे हैं।" — डॉ. अरविंद पटेल, वैश्विक प्रवासी विश्लेषक।
| पहलू | अमेरिका (US) में प्रतिक्रिया | ब्रिटेन (UK) में प्रतिक्रिया |
|---|---|---|
| राजनीतिक प्रतिक्रिया | कड़ा विरोध; 90 से अधिक नेताओं ने आरएसएस से चंदा न लेने का संकल्प लिया। | संसद में आव्रजन (इमिग्रेशन) नियमों को लेकर सवाल उठाए गए; कोई औपचारिक बहिष्कार नहीं। |
| सामुदायिक प्रतिक्रिया | धार्मिक नेताओं ने धोखे से कार्यक्रम में बुलाए जाने का आरोप लगाया। | स्थानीय ब्रिटिश हिंदू संगठनों द्वारा गर्मजोशी से स्वागत और अभिनंदन। |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के कार्यक्रम को लेकर क्या विवाद है?
उत्तर 1: कुछ धार्मिक नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें एक सामान्य शांति या सांस्कृतिक कार्यक्रम का झांसा देकर बुलाया गया था, जबकि वह आरएसएस का आधिकारिक कार्यक्रम था।
प्रश्न 2: अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने क्या कदम उठाया है?
उत्तर 2: रो खन्ना और 90 अन्य अमेरिकी नेताओं ने आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों से किसी भी प्रकार का चंदा न लेने का संकल्प लिया है।