भारत के चुनावी इतिहास के सबसे अनोखे व्यक्तित्व, 'धरतीपकड़' नागर्मल बाजोरिया का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने देश के बड़े नेताओं के खिलाफ 280 से अधिक चुनाव लड़कर लोकतंत्र को नई परिभाषा दी थी।

  • नागर्मल बाजोरिया का 97 वर्ष की आयु में पटना में निधन।
  • जीवनकाल में कुल 280 से अधिक चुनाव लड़ने का अद्भुत रिकॉर्ड।
  • इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गजों के खिलाफ चुनाव लड़े।
  • 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में वी.वी. गिरि के खिलाफ नामांकन किया था।

भारतीय लोकतंत्र के एक ऐसे अनूठे अध्याय का अंत हो गया है, जिसने चुनाव को केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि जन-जागरूकता का माध्यम बनाया। 'धरतीपकड़' नागर्मल बाजोरिया, जिन्होंने अपने जीवन में 280 से अधिक बार चुनावी मैदान में उतरकर इतिहास रचा, उनका 97 वर्ष की आयु में पटना में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार बिहार के भागलपुर में गंगा नदी के तट पर बरारी घाट पर किया जाएगा।

1930 में लाहौर में जन्मे बाजोरिया विभाजन के समय अपने परिवार के साथ भागलपुर आ गए थे। हालांकि वे पेशे से एक व्यवसायी थे, लेकिन चुनावी मैदान में उनकी उपस्थिति ने उन्हें एक जननायक बना दिया। उनके पोते सौरव बाजोरिया के अनुसार, उनके दादा चुनाव केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिक को यह अहसास कराने के लिए लड़ते थे कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति की आवाज मायने रखती है।

ऐतिहासिक राजनीतिक सफर

नागर्मल बाजोरिया का चुनावी सफर 1960 में भागलपुर नगर पालिका चुनाव में जीत के साथ शुरू हुआ था। इसके बाद उन्होंने देश के सबसे प्रभावशाली नेताओं के खिलाफ अपनी दावेदारी पेश की। उन्होंने इंदिरा गांधी (रायबरेली), राजीव गांधी (अमेठी), संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, एलके आडवाणी और प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गजों के खिलाफ चुनाव लड़कर भारतीय राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

उनका सबसे साहसी कदम 1969 का राष्ट्रपति चुनाव था, जहां उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार वी.वी. गिरि के खिलाफ नामांकन दाखिल किया था। उन्होंने 2019 तक लगातार चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाई।

अनोखी चुनावी शैली और सामाजिक कार्य

बाजोरिया अपनी अनोखी प्रचार शैली के लिए जाने जाते थे। वे अक्सर गांधी युग की पुरानी घड़ी पहनते थे और हाथ में एक घंटी लेकर चलते थे। रैलियों के दौरान वे घंटी बजाकर लोगों को लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक करते थे। 2005 के चुनावों में, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए उन्होंने गधों के गले में नारे लिखे हुए तख्तियां लटकाकर एक अनोखी रैली निकाली थी, जिसने सबका ध्यान खींचा था।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, नागर्मल बाजोरिया का जीवन केवल चुनावी आंकड़ों का खेल नहीं था, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस भावना का प्रतीक था जहाँ एक साधारण व्यक्ति भी सर्वोच्च पदों के लिए चुनौती दे सकता है। उनकी निरंतरता ने चुनावी प्रक्रिया को एक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया था।

नागर्मल बाजोरिया जैसे व्यक्तित्व लोकतंत्र के प्रहरी होते हैं, जो सत्ता के अहंकार को चुनौती देकर नागरिक चेतना को जीवित रखते हैं।
Did You Know?: नागर्मल बाजोरिया ने भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए एक बार गधों के साथ चुनावी रैली का आयोजन किया था।

Frequently Asked Questions

1. नागर्मल बाजोरिया को 'धरतीपकड़' क्यों कहा जाता था?
उनकी चुनावी सक्रियता और जमीन से जुड़े रहकर लगातार चुनाव लड़ने की प्रवृत्ति के कारण उन्हें यह नाम मिला।

2. उन्होंने किन प्रमुख नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा?
उन्होंने इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और प्रणब मुखर्जी जैसे भारत के शीर्ष नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा था।