गृह मंत्रालय के साथ हुई बैठक के बाद सोनम वांगचुक और लद्दाख के नेताओं ने निराशा जताई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर ठोस प्रस्ताव नहीं मिला, तो लद्दाख में आंदोलन तेज किया जाएगा।
- गृह मंत्रालय (MHA) के साथ वार्ता बेनतीजा रही, कोई ठोस प्रस्ताव पेश नहीं किया गया।
- लद्दाख के नेता 19 से 24 सितंबर तक पदयात्रा करने की योजना बना रहे हैं।
- मुख्य मांगें: निर्वाचित नेतृत्व की नौकरशाही पर सर्वोच्चता और अनुच्छेद 371(K) के तहत सुरक्षा।
- भूमि आवंटन और प्रशासनिक निर्णयों पर रोक लगाने की मांग।
नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ हुई हालिया बातचीत को केवल औपचारिक बताया। वांगचुक ने तंज कसते हुए कहा, "बातचीत सौहार्दपूर्ण थी, चाय अच्छी थी, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई।" उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रतिनिधिमंडल को उम्मीद थी कि 22 मई को बनी 'सैद्धांतिक सहमति' के बाद सरकार एक लिखित ड्राफ्ट प्रस्ताव लेकर आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
लद्दाख के प्रतिनिधिमंडल ने सरकार के सामने कुछ 'गैर-परक्राम्य' (non-negotiables) शर्तें रखी थीं। इनमें सबसे प्रमुख था कि नौकरशाही के ऊपर निर्वाचित केंद्र शासित प्रदेश (UT) स्तर के नेता का वर्चस्व हो और कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण हो। नेताओं ने यह भी मांग की कि जब तक एक लोकतांत्रिक ढांचा स्थापित नहीं हो जाता, तब तक लद्दाख प्रशासन कोई भी बड़ा निर्णय न ले।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the deadlock between the MHA and the Ladakh leadership is not just about administrative power, but about the existential fear of losing land and cultural identity. The insistence on Article 371(K) highlights a deep-rooted desire for constitutional safeguards similar to those in other sensitive border regions of India.
लद्दाख में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की कमी और नौकरशाही का बढ़ता प्रभाव क्षेत्र में असंतोष को जन्म दे रहा है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी संवेदनशील है।
लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) के बीच मुख्य विवाद नौकरशाही नियंत्रण को लेकर है। हालांकि गृह मंत्रालय ने एक निर्वाचित निकाय का प्रस्ताव दिया है जिसे भूमि, संस्कृति और पर्यावरण पर अधिकार होगा, लेकिन कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर स्पष्टता की कमी है।
केडीए के सह-अध्यक्ष सज्जाद कारगिली ने मुख्य सचिव आशीष कुंडरा की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे वहां 'नीट परीक्षा' देने नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मांग करने गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल तब बैठकें बुलाती है जब आंदोलन और पदयात्रा की बात होती है, जो उसकी गंभीरता पर सवाल उठाता है।
इसके अलावा, 24 सितंबर 2025 की हिंसा, जिसमें चार लोगों की जान गई थी, अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। आंदोलनकारी नेताओं ने प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को तुरंत वापस लेने और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की मांग की है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: लद्दाख के नेताओं की मुख्य मांगें क्या हैं?
मुख्य मांगों में पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा, और नौकरशाही के बजाय निर्वाचित प्रतिनिधियों का नियंत्रण शामिल है।
प्रश्न 2: यदि सरकार प्रस्ताव नहीं देती है तो अगला कदम क्या होगा?
नेताओं ने घोषणा की है कि वे 19 से 24 सितंबर तक एक व्यापक पदयात्रा आयोजित करेंगे।