विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। राज्य, समाज और बाजार के बीच एक समन्वित और विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण ही वास्तविक सुशासन और समावेशी विकास सुनिश्चित कर सकता है।
- विकसित भारत के लिए राज्य, समाज और बाजार का त्रिकोणीय सहयोग अनिवार्य है।
- विकेंद्रीकृत सामुदायिक कार्रवाई और स्थानीय भागीदारी से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
- महिला एजेंसी और तकनीक को शासन के मुख्य स्तंभों के रूप में विकसित करना होगा।
- शहरी शासन में 'बस्ती स्तर' पर प्रत्यक्ष चुनाव और जवाबदेही की आवश्यकता है।
भारत के विकास की यात्रा में अब एक ऐसे मोड़ पर आने का समय है जहाँ 'सरकारी' को 'असरकारी' (प्रभावशाली) बनाने की आवश्यकता है। हाल के शोध और जिला परिषदों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ बातचीत से यह स्पष्ट हुआ है कि जब शासन में समुदाय की भागीदारी होती है, तो जटिल समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से निकलता है। स्वच्छ भारत सर्वेक्षण 2024 के शीर्ष नगर आयुक्तों की सफलता का मुख्य कारण भी सामुदायिक भागीदारी और सहयोगात्मक शासन ही रहा है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) की सफलता, जिसमें करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जुड़ी हैं, इस बात का प्रमाण है कि जब प्रबंधन को क्लस्टर स्तर तक विकेंद्रीकृत किया जाता है, तो परिणाम व्यापक और स्थायी होते हैं। समावेशी समाज के निर्माण के लिए छह प्रमुख कारकों की पहचान की गई है: विकेंद्रीकृत सामुदायिक कार्रवाई, सहयोगात्मक शासन, महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता, तकनीक का उपयोग, जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास, तथा पेशेवर सामुदायिक संसाधन व्यक्ति।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन 'विकट समस्याओं' (Wicked Problems) जैसे कि गरीबी का चक्र और निम्न उत्पादकता को केवल ऊपर से नीचे (Top-down) के दृष्टिकोण से हल नहीं किया जा सकता। जब नागरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं, तो सार्वजनिक विश्वास बढ़ता है और शासन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
"सुशासन तब होता है जब राज्य, समाज और बाजार मिलकर परिणामों की जिम्मेदारी लेते हैं, न कि केवल प्रक्रियाओं की।"
ऐतिहासिक रूप से, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और साक्षरता अभियानों ने यह सिद्ध किया है कि पेशेवरों और नागरिकों के बीच सहयोग से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। केरल, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने इस विकेंद्रीकृत मॉडल के माध्यम से मानव विकास संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार किया है। हालांकि, नौकरशाही की जड़ता और केंद्रीकरण की प्रवृत्ति अक्सर इन प्रयासों में बाधा बनती है।
शहरी क्षेत्रों में, शासन की चुनौतियों के लिए संस्थागत सुधार अनिवार्य हैं। वर्तमान वार्ड प्रणाली के बजाय 'बस्ती स्तर' पर प्रत्यक्ष चुनाव की आवश्यकता है ताकि शासन समुदाय के और करीब पहुंच सके। जिस प्रकार आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को जवाबदेह बनाया है, उसी प्रकार स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की फौज तैयार करनी होगी।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: सहयोगात्मक शासन (Collaborative Governance) क्या है?
उत्तर: यह एक ऐसी प्रणाली है जहाँ सरकार, निजी क्षेत्र (बाजार) और नागरिक समाज मिलकर सार्वजनिक समस्याओं का समाधान करते हैं और परिणामों के लिए साझा जवाबदेही तय करते हैं।
प्रश्न 2: शहरी शासन में 'बस्ती स्तर' के चुनाव क्यों जरूरी हैं?
उत्तर: बड़े वार्डों में स्थानीय समस्याओं की अनदेखी हो जाती है। बस्ती स्तर के चुनाव से शासन अधिक जवाबदेह होगा और संसाधन सीधे समुदाय की जरूरतों तक पहुँचेंगे।