सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को स्थगित नहीं किया, जिससे भोजशाला‑कमल मौला मस्जिद परिसर को मंदिर घोषित किया गया। कोर्ट ने धारा प्रशासन को शुक्रवार की नमाज़ के लिए निकटवर्ती खुला स्थल खोजने का निर्देश दिया, साथ ही बिना अनुमति संरचनात्मक बदलाव पर रोक लगाई।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मंदिर घोषित करने वाले हाई कोर्ट के आदेश को स्थगित नहीं किया।
  • मुस्लिम याचिकाकर्ताओं को शुक्रवार की नमाज़ के लिए निकटवर्ती वैकल्पिक स्थल प्रदान करने का निर्देश दिया गया।
  • कोई भी संरचनात्मक परिवर्तन सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना नहीं किया जा सकेगा।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 15 मई के फैसले को स्थगित नहीं किया, जिसमें भोजशाला‑कमल मौला मस्जिद परिसर को मंदिर घोषित किया गया और मुस्लिमों को वहाँ नमाज़ अर्पित करने से रोक दिया गया। इस निर्णय के बाद कोर्ट ने तीन मुस्लिम याचिकाओं को सुनने की अनुमति दी, जो इस बात पर आधारित थीं कि हाई कोर्ट ने 700‑वर्षीय दस्तावेज़ीय साक्ष्य को नज़रअंदाज़ किया और 23‑वर्षीय साझा उपयोग व्यवस्था को बाधित किया।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ

भोजशाला परिसर, मध्य प्रदेश के धारा जिले में स्थित, ऐतिहासिक रूप से एक बहु‑धर्मिक स्थल रहा है। 2003 में पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने शुक्रवार को मुस्लिमों द्वारा नमाज़ और मंगलवार को हिन्दुओं द्वारा पूजा की अनुमति दी थी, जिससे दोनों समुदायों के बीच एक अनौपचारिक समझौता स्थापित हुआ। हालांकि, 2024 में इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले कई मुकदमों ने इस स्थल को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना दिया, जिसके परिणामस्वरूप 2025 में उच्च न्यायालय ने इसे मंदिर घोषित किया।

सुप्रीम कोर्ट का आज्ञा-पत्र

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची व वी. मोहन के बेंच ने इस मामले में संभावित सामाजिक तनाव को लेकर चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जाए जो शांति को खतरे में डाल सके। हम इस मुद्दे को प्रतिदिन सुनने के लिए तैयार हैं और शीघ्र समाधान करेंगे।” इसके बाद कोर्ट ने धारा जिला प्रशासन को भोजशाला परिसर के पास या निकटवर्ती खुले स्थान की पहचान करने का निर्देश दिया, जहाँ मुस्लिमों को शुक्रवार की नमाज़ अदा करने की सुविधा मिल सके, और प्रवेश‑निकास में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

कानूनी पहलू और भविष्य की संभावनाएँ

मुस्लिम वकीलों ने इस फैसले को ‘स्थल‑विशिष्ट उपासना अधिनियम, 1991’ के तहत अनुचित कहा, क्योंकि वह अधिनियम मौजूदा धार्मिक स्थलों की स्थिति‑को‑बदलाव से रोकता है। उन्होंने हाई कोर्ट के निर्णय को ‘ऐतिहासिक त्रुटि’ और ‘कानूनी उल्लंघन’ के रूप में चुनौती दी। दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील तुषार मेहता ने बताया कि हाई कोर्ट के आदेश को स्थगित करने से मौजूदा शांति व्यवस्था बिगड़ सकती है, क्योंकि हाल ही में इस विवाद से जुड़े छोटे‑छोटे दंगे हुए हैं।

आगे का रास्ता

कोर्ट ने दोनों पक्षों से धैर्य रखने को कहा और बताया कि सुनवाई अगले तीन हफ्तों में पूरी की जा सकती है। हिन्दू पक्ष के प्रतिनिधि गुरु कृष्ण कुमार ने भी इस बात पर सहमति व्यक्त की कि विवाद को जल्द सुलझाया जाए। इस बीच, प्रशासनिक कार्रवाई को तेज़ी से लागू करने के लिए कोर्ट ने चेतावनी दी कि बिना अनुमति के कोई भी संरचनात्मक परिवर्तन गंभीर परिणाम ला सकता है।