नेपाल और तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ ने 160 लोगों की जान ले ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों का अस्थिर होना और उनका अचानक गिरना इस त्रासदी का मुख्य कारण हो सकता है।
- नेपाल और तिब्बत सीमा पर अचानक आई बाढ़ में 160 से अधिक लोगों की मौत और दर्जनों पर्यटकों के लापता होने की खबर।
- सैटेलाइट इमेजरी संकेत देती है कि एक विशाल ग्लेशियर के टुकड़े गिरने से भूस्खलन हुआ, जिससे बाढ़ आई।
- ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और अस्थिर हो रहे हैं।
- दुनिया के 40% ग्लेशियर बर्फ के गायब होने के कगार पर हैं यदि तापमान वृद्धि 1.5°C से ऊपर रही।
नेपाल और तिब्बत की पहाड़ी सीमा पर बुधवार को आई अचानक बाढ़ (Flash Floods) ने भारी तबाही मचाई है। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, इस आपदा में लगभग 160 लोगों की मृत्यु हो चुकी है और दर्जनों अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों सहित सैकड़ों लोग अभी भी लापता हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि पानी की एक विशाल दीवार ने इमारतों और वाहनों को तिनके की तरह बहा दिया।
वैज्ञानिक विश्लेषण और सैटेलाइट डेटा से संकेत मिलता है कि यह आपदा एक बड़े ग्लेशियर के अचानक ढहने के कारण हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि सैकड़ों फीट ऊपर से बर्फ का एक विशाल हिस्सा गिरने के कारण भूस्खलन हुआ, जिसने घाटी में पानी का सैलाब ला दिया। यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के अनुसार, इस मलबे के प्रवाह की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इसने 5.2 तीव्रता के भूकंप के समान कंपन पैदा किया।
बढ़ते तापमान का घातक प्रभाव
ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रक्रिया हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न ब्रिटिश कोलंबिया के भूगोल के एसोसिएट प्रोफेसर जोसेफ शेया के अनुसार, ग्लेशियरों का द्रव्यमान कम हो रहा है और वे तेजी से पतले हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे ग्लेशियर सिकुड़ते हैं, वे तलछट (sediment) को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने से ऊंचे स्थानों पर बड़ी झीलें बन रही हैं, और यदि कोई भूस्खलन इन झीलों में गिरता है, तो यह विनाशकारी 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड' का कारण बनता है।
बोज़ोकमीडिया (BozokMedia) विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल नेपाल की समस्या नहीं है, बल्कि एक वैश्विक संकट है। वर्ष 2000 के बाद से दुनिया के ग्लेशियरों ने अपने 5% बर्फ खो दी है। नेपाल के संदर्भ में, 1970 और 2010 के बीच उसके ग्लेशियरों ने अपने क्षेत्रफल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा खो दिया था।
क्यों बढ़ रहा है यह खतरा?
कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के भूविज्ञानी डैनियल शुगर ने बताया कि सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि लगभग 2,000 फीट चौड़ा बर्फ का एक टुकड़ा लगभग 4,000 फीट नीचे गिरा, जिससे वह पानी में बदल गया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पिछले सप्ताह के गर्म तापमान के कारण ग्लेशियर पर मौजूद बर्फ पिघल गई होगी।
तापमान में वृद्धि केवल बर्फ को नहीं पिघलाती, बल्कि 'अल्पाइन परमाफ्रॉस्ट' (Alpine Permafrost) को भी अस्थिर करती है। जब जमीन का तापमान बढ़ता है, तो वे बड़े चट्टानी ब्लॉक जो सदियों से जमे हुए थे, अचानक हिलने लगते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर तबाही होती है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: नेपाल की बाढ़ का मुख्य कारण क्या माना जा रहा है?
उत्तर: प्रारंभिक विश्लेषण के अनुसार, ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के अचानक गिरने और उसके कारण हुए भूस्खलन को मुख्य कारण माना जा रहा है।
प्रश्न 2: ग्लोबल वार्मिंग ग्लेशियरों को कैसे प्रभावित कर रही है?
उत्तर: बढ़ता तापमान ग्लेशियरों को पतला कर रहा है, उन्हें अस्थिर बना रहा है और उनके पीछे हटने से विनाशकारी बाढ़ का खतरा पैदा कर रहा है।