एक नए शोध से पता चला है कि पिछले 40 वर्षों में एल नीनो की घटनाएं पिछले एक सहस्राब्दी की तुलना में कहीं अधिक तीव्र हो गई हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि इस जलवायु पैटर्न को और अधिक विनाशकारी बना रही है।
- पिछले 40 वर्षों के एल नीनो पूर्व-औद्योगिक युग की तुलना में लगभग 40% अधिक शक्तिशाली रहे हैं।
- गलापागोस द्वीपों के प्राचीन कोरल रीफ्स के विश्लेषण से 1,000 साल पुराने जलवायु रिकॉर्ड का खुलासा हुआ।
- ग्लोबल वार्मिंग एल नीनो की तीव्रता को 'सुपरचार्ज' कर रही है, जिससे चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं।
प्रशांत महासागर में आकार ले रहा वर्तमान एल नीनो (El Nino) केवल एक सामान्य जलवायु चक्र नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर चेतावनी है। हालिया शोध के अनुसार, पिछले चार दशकों में एल नीनो की तीव्रता में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है, जो पिछले 1,000 वर्षों के किसी भी रिकॉर्ड से कहीं अधिक है। वैज्ञानिकों ने पाया कि आधुनिक एल नीनो घटनाएं पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में लगभग 40% अधिक शक्तिशाली हो गई हैं।
इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए शोधकर्ताओं ने गलापागोस द्वीपों के 13 आधुनिक और प्राचीन कोरल (मूंगा) नमूनों का गहन विश्लेषण किया। कोरल रीफ्स प्राकृतिक डेटा स्टोरहाउस के रूप में कार्य करते हैं, जिनके रासायनिक संरचना में सदियों पुराने समुद्री तापमान के सुराग छिपे होते हैं। विश्लेषण से पता चला कि जबकि अतीत में एल नीनो का एक स्थिर और कम तीव्रता वाला पैटर्न था, पिछले 40-50 वर्षों में इसमें अचानक और तीव्र उछाल आया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह केवल एक समुद्री घटना नहीं है, बल्कि मानवीय गतिविधियों द्वारा प्रेरित जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष परिणाम है। जब एल नीनो जैसी प्राकृतिक घटना ग्लोबल वार्मिंग के साथ मिलती है, तो यह एक 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' पैदा करती है। इसका मतलब है कि जो सूखा या बाढ़ पहले मध्यम होती थी, वह अब विनाशकारी रूप ले लेगी।
"हम अतीत में ऐसा कोई समय नहीं देखते जहां एल नीनो आज की तरह मजबूत रहे हों; यह स्पष्ट है कि एल नीनो की शक्ति वैश्विक तापमान की वृद्धि के समानांतर बदल रही है।" - जूलिया कोल, मिशिगन विश्वविद्यालय।
भारत पर प्रभाव: भारत एल नीनो के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। ऐतिहासिक रूप से, इस घटना का संबंध कमजोर मानसून, उच्च तापमान और लंबे सूखे के दौर से रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही चेतावनी दी थी कि एल नीनो मानसून के दौरान मजबूत होगा। जून में भारत की वर्षा सामान्य से 40% कम रही, जो कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह घटना एक पहले से ही गर्म ग्रह पर घटित हो रही है। ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली तापमान वृद्धि और एल नीनो का संयुक्त प्रभाव वैश्विक तापमान को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.7-1.8°C ऊपर ले जा सकता है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: एल नीनो का भारत के मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: एल नीनो आमतौर पर भारत में मानसून की बारिश को कम करता है, जिससे सूखे की स्थिति पैदा होती है और फसल उत्पादन प्रभावित होता है।
प्रश्न 2: क्या ग्लोबल वार्मिंग एल नीनो को प्रभावित कर रही है?
उत्तर: हाँ, ग्लोबल वार्मिंग समुद्र के तापमान को बढ़ा रही है, जिससे एल नीनो की तीव्रता और उससे होने वाले दुष्प्रभाव अधिक विनाशकारी हो रहे हैं।