मुजफ्फरनगर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने एक दहेज हत्या मामले में 23वीं फांसी की सजा सुनाई है। इस फैसले के साथ ही उन्होंने न्यायिक प्रणाली पर माफियाओं के प्रभाव और खुद को मिले धमकियों का खुलासा कर सनसनी मचा दी है।
- जज रवि कुमार दिवाकर ने पिछले 5 महीनों में कुल 23 मृत्युदंड की सजा सुनाई है।
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश में न्यायिक प्रणाली पर माफिया और गैंगस्टरों के दबाव का गंभीर आरोप लगाया।
- ज्ञानवापी मामले के बाद से जज और उनके परिवार को लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं।
मुजफ्फरनगर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। सोमवार (7 सितंबर, 2026) को उन्होंने एक दहेज हत्या के मामले में आरोपी मोहम्मद नदीम को मृत्युदंड सुनाया। इस फैसले के साथ ही पिछले पांच महीनों में उनके द्वारा सुनाई गई फांसी की सजाओं की संख्या बढ़कर 23 हो गई है। कोर्ट ने इस हत्याकांड को 'अत्यंत क्रूर और बर्बर' बताते हुए इसे 'दुर्लभतम से दुर्लभ' (Rarest of Rare) श्रेणी में रखा।
इस मामले में एक चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब शाहजादी के माता-पिता सहित कई मुख्य गवाह मुकर गए। हालांकि, जज दिवाकर ने मृतक के 'मृत्यु पूर्व कथन' (Dying Declaration) को आधार मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया। लेकिन इस फैसले से ज्यादा चर्चा जज द्वारा अपने आदेश में लिखे गए व्यक्तिगत विचारों की हो रही है।
न्यायपालिका पर माफिया का साया
जज दिवाकर ने अपने फैसले में गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माफिया और गैंगस्टरों का न्यायिक प्रणाली पर गहरा प्रभाव है। उन्होंने आरोप लगाया कि दबाव में आकर कई आपराधिक मामले वापस ले लिए जाते हैं या उनमें देरी की जाती है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें एक गैंगस्टर द्वारा धमकी दी गई थी कि यदि उन्होंने इन मुद्दों पर आवाज उठाई, तो उनका तबादला कर दिया जाएगा।
"मैं एक डरपोक न्यायाधीश कहलाने के बजाय मरना पसंद करूँगा।" - न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह मामला केवल एक कानूनी फैसले का नहीं है, बल्कि यह भारत की निचली न्यायपालिका में व्याप्त सुरक्षा चुनौतियों और राजनीतिक-अपराधिक गठजोड़ को उजागर करता है। जब एक sitting judge खुलेआम माफिया के दबाव की बात करता है, तो यह संकेत है कि न्यायिक स्वतंत्रता खतरे में है। यह मामला न्यायिक अधिकारियों के मनोबल और उनकी सुरक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
जज दिवाकर ने अपने आदेश में न्यायिक अधिकारियों के इतिहास का जिक्र करते हुए 1982 में जस्टिस चंद्रशेखर प्रसाद सिंह, 2001 में सीजेएम बल्क राम और 2021 में जज उत्तम आनंद की हत्याओं का उल्लेख किया। उन्होंने तर्क दिया कि ये घटनाएं दर्शाती हैं कि गंभीर आपराधिक मामलों को सुनते समय जज कितने असुरक्षित होते हैं।
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| कुल मृत्युदंड (5 माह) | 23 |
| ताजा मामला | दहेज हत्या (मोहम्मद नदीम) |
| प्रमुख चिंता | माफिया का प्रभाव और सुरक्षा की कमी |
Frequently Asked Questions
1. जज रवि कुमार दिवाकर ने मृत्युदंड के लिए किस आधार का उपयोग किया?
उन्होंने 'दुर्लभतम से दुर्लभ' सिद्धांत का उपयोग किया और गवाहों के मुकरने के बावजूद मृतक के 'डाइंग डिक्लेरेशन' को निर्णायक सबूत माना।
2. जज ने सुरक्षा के संबंध में क्या शिकायत की?
उन्होंने आरोप लगाया कि ज्ञानवापी मामले के बाद उन्हें मिली धमकियों के बावजूद स्थानीय अधिकारियों ने पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं की और उनका सुरक्षा घेरा कम कर दिया गया।