केंद्र सरकार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में है, जिसने एक कानून छात्रा की एनएसए हिरासत को रद्द करते हुए जिला मजिस्ट्रेट की कड़ी आलोचना की थी।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया था।
- कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की कार्यप्रणाली को 'उपहास योग्य' बताया और उन्हें अपनी शपथ का उल्लंघन करने का दोषी माना।
- अदालत ने छात्रा को 5 लाख रुपये मुआवजा देने और यह राशि जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने का आदेश दिया था।
केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को मौखिक रूप से संकेत दिया कि सरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने का इरादा रखती है, जिसमें गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम द्वारा एक 25 वर्षीय दिल्ली विश्वविद्यालय की कानून छात्रा की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया गया था।
यह मामला इस साल अप्रैल में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। जस्टिस अतुल श्रीधरन की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने 2 सितंबर को अपने आदेश में छात्रा आकृति चौधरी की हिरासत को अवैध ठहराते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने पाया कि प्रशासन ने पुलिस रिपोर्ट पर बिना विचार किए मनमाने ढंग से एनएसए का उपयोग किया।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this case highlights a growing tension between administrative discretion and judicial oversight regarding preventive detention laws. The use of the NSA against a student activist with no prior criminal record is seen as a dangerous precedent that could stifle democratic protests and freedom of speech.
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य के संस्करण को एक "गढ़ी हुई कहानी" (concocted story) करार दिया। कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी नोटिस में गंभीर विसंगतियां थीं और जिला मजिस्ट्रेट ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है।
"जब प्रशासनिक अधिकारी कानून के प्रावधानों का उपयोग राजनीतिक या व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के लिए करते हैं, तो यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे के लिए खतरा बन जाता है।"
ऐतिहासिक रूप से, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) का उपयोग राज्य की सुरक्षा के लिए किया जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में इसे नागरिक कार्यकर्ताओं और छात्रों के खिलाफ उपयोग करने के आरोप लगे हैं। इस मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करना कोई अपराध नहीं है।
| पक्ष | तर्क/अवलोकन |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश पुलिस | आरोपित कि छात्रा ने पत्थरबाजी और आगजनी के लिए उकसाया; इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का दावा। |
| इलाहाबाद हाईकोर्ट | हिरासत को मनमाना बताया; जिला मजिस्ट्रेट को शपथ के उल्लंघन का दोषी माना। |
Frequently Asked Questions
1. कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट के खिलाफ क्या सख्त कदम उठाए?
कोर्ट ने छात्रा को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि यह राशि जिला मजिस्ट्रेट और जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए।
2. आकृति चौधरी को किस आरोप में हिरासत में लिया गया था?
उन पर नोएडा में वेतन वृद्धि की मांग कर रहे श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन को भड़काने और हिंसा फैलाने का आरोप था।