अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिनों का युद्धविराम बिना किसी अंतिम समझौते के समाप्त हो गया है। परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर तनाव चरम पर है।

  • जून में हस्ताक्षरित 60 दिनों के युद्धविराम की समय सीमा बिना किसी स्थायी संधि के समाप्त हो गई है।
  • ईरान के संवर्धित यूरेनियम और होर्मुज जलडमरूमध्य पर विवाद विफलता के मुख्य कारण रहे।
  • रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के मिसाइल भंडार कम हो गए हैं, जिससे कूटनीतिक दबाव बनाना कठिन होगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच शांति की नाजुक उम्मीदें एक बार फिर टूट गई हैं। जून में वर्साय में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन द्वारा हस्ताक्षरित 60 दिवसीय युद्धविराम का उद्देश्य युद्ध को समाप्त करने के लिए एक 'अंतिम समझौते' का मार्ग प्रशस्त करना था। लेकिन सोमवार को इस समय सीमा के समाप्त होने तक, युद्ध के अंत का कोई संकेत नहीं मिला है।

इस 14-सूत्रीय ढांचे को पाकिस्तान और अन्य खाड़ी देशों ने मध्यस्थता के जरिए तैयार किया था। इस समझौते में सभी सैन्य अभियानों को रोकने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम—जिसे ईरान हमेशा नागरिक उपयोग के लिए बताता रहा है—और उसके शक्तिशाली मिसाइल शस्त्रागार से जुड़ी अमेरिकी और इजरायली चिंताओं को दूर करने का रोडमैप शामिल था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इस समझौते की विफलता केवल दो देशों के बीच का राजनयिक गतिरोध नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा की पूरी व्यवस्था का ढहना है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जिससे दुनिया की लगभग 20% तेल और गैस आपूर्ति गुजरती है, पर नियंत्रण न हो पाना वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा।

समझौते में दरारें तब आईं जब हस्ताक्षर के एक हफ्ते बाद ही ईरान ने ओमान के तट के साथ यात्रा करने वाले जहाजों पर हमला किया। यह मार्ग अमेरिकी नौसेना द्वारा 'सुरक्षित' किया जाना था ताकि तेहरान के नियंत्रण से बचा जा सके। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान पर हमला किया, और ईरान ने जवाबी कार्रवाई में जॉर्डन, कुवैत और बहरीन जैसे उन अरब देशों पर हमले किए जहाँ अमेरिकी सेना तैनात है।

"वर्साय ढांचे का ढहना इस बात को रेखांकित करता है कि परमाणु संप्रभुता पर बड़े समझौतों के बिना कोई भी अल्पकालिक युद्धविराम गहरे अविश्वास को खत्म नहीं कर सकता।"

8 जुलाई को राष्ट्रपति ट्रंप ने इस समझौता ज्ञापन (MoU) को 'खत्म' घोषित कर दिया था। सोमवार को उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार हासिल न कर सके।

इस गतिरोध को और जटिल खुफिया रिपोर्टों ने बना दिया है, जिनमें कहा गया है कि अमेरिका का मिसाइल भंडार काफी कम हो गया है। हथियारों की यह कमी ट्रंप प्रशासन के लिए बातचीत में ऊपरी हाथ रखना मुश्किल बना रही है, जिससे पश्चिम एशिया में संघर्ष के लंबे समय तक खिंचने की संभावना बढ़ गई है।

मुख्य मुद्दा अमेरिका का पक्ष ईरान का पक्ष
परमाणु कार्यक्रम संवर्धित यूरेनियम का पूर्ण निपटान केवल नागरिक उपयोग; संप्रभु अधिकार
होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा और खुला मार्ग ईरानी क्षेत्रीय नियंत्रण और निगरानी
सैन्य उपस्थिति खाड़ी देशों में रणनीतिक ठिकाने क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी की मांग
क्या आप जानते हैं?: होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक 'चोक पॉइंट्स' में से एक है; यदि यह बंद हो जाता है, तो तेल टैंकरों को अफ्रीका के चारों ओर लंबा और महंगा रास्ता अपनाना होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 60 दिनों का युद्धविराम क्यों विफल रहा?
यह समझौता आपसी उल्लंघन के आरोपों, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री हमलों और संवर्धित यूरेनियम के निपटान पर सहमति न बन पाने के कारण विफल रहा।

2. इस संघर्ष में होर्मुज जलडमरूमध्य का क्या महत्व है?
यह दुनिया की 20% तेल और गैस आपूर्ति का मुख्य मार्ग है। इस पर नियंत्रण ईरान को वैश्विक तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भारी दबाव डालने की शक्ति देता है।