भारत ने खाद्य सुरक्षा हासिल कर ली है, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों के बीच इस व्यवस्था को सुरक्षित और लचीला बनाना अनिवार्य हो गया है।

  • भारत ने 1960 के दशक की खाद्य सहायता पर निर्भरता से निकलकर एक प्रमुख खाद्य उत्पादक देश का दर्जा प्राप्त किया है।
  • जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और बढ़ते तापमान से वर्तमान चावल-गेहूं आधारित प्रणाली को खतरा है।
  • खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने के लिए मोटे अनाज (Millets), दलहन और तिलहन जैसे विविध फसलों के आधार को मजबूत करना होगा।
  • भंडारण, परिवहन और सिंचाई प्रणालियों को जलवायु-अनुकूल बनाना अब प्राथमिकता होनी चाहिए।

भारत की खाद्य सुरक्षा यात्रा दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कृषि परिवर्तनों में से एक रही है। 1960 के दशक में खाद्य सहायता पर निर्भर रहने वाले देश से लेकर, आज भारत एक प्रमुख खाद्य उत्पादक बनकर उभरा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के माध्यम से देश ने लगभग 80 करोड़ लोगों के लिए खाद्यान्न सब्सिडी सुनिश्चित की है। हालांकि, यह उपलब्धि अब एक नए और गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी है: जलवायु परिवर्तन

बदलते मौसम के पैटर्न, अत्यधिक गर्मी और अनिश्चित वर्षा ने उत्पादन से लेकर भंडारण और वितरण तक की पूरी श्रृंखला को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। भारत के पास उत्पादन क्षमता तो है—2024-25 में खाद्यान्न उत्पादन 350 मिलियन टन से अधिक रहा—लेकिन इस उत्पादन को सुरक्षित रखना अब एक बड़ी चुनौती है।

क्यों यह महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि भारत की वर्तमान कृषि रणनीति मुख्य रूप से चावल और गेहूं के चक्र पर टिकी है, जो कुछ ही भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित है। यह मॉडल ऐतिहासिक रूप से सफल रहा है, लेकिन वर्तमान में यह भूजल के अत्यधिक दोहन और जलवायु जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता का कारण बन रहा है। यदि भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा को दीर्घकालिक बनाना है, तो उसे अपनी खरीद नीति में विविधता लानी होगी।

जलवायु परिवर्तन केवल उत्पादन को प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह आपूर्ति श्रृंखला, बाजार की अस्थिरता और पोषण की उपलब्धता को भी सीधे तौर पर बाधित करता है।

भारत को अब केवल 'पर्याप्त भोजन' पैदा करने से आगे बढ़कर 'जलवायु-लचीली खाद्य प्रणाली' बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसमें मोटे अनाज (Millets), दलहन और तिलहन को बढ़ावा देना शामिल है, जो न केवल पोषण प्रदान करते हैं बल्कि कम पानी में भी उग सकते हैं।

तकनीकी और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता

जलवायु जोखिमों को कम करने के लिए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों को सीधे खरीद और बफर स्टॉक निर्णयों से जोड़ना होगा। किसानों को जलवायु-अनुकूल बीज, सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और मौसम-आधारित बीमा जैसे उपकरण प्रदान करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, भंडारण के लिए ऐसे गोदामों की आवश्यकता है जो अत्यधिक तापमान को सहन कर सकें और परिवहन के लिए मजबूत कोल्ड-चेन नेटवर्क की जरूरत है।Did You Know?: मोटे अनाज (Millets) को 'सुपरफूड' माना जाता है क्योंकि वे कम वर्षा और खराब मिट्टी में भी उच्च पोषण के साथ उग सकते हैं।

Frequently Asked Questions

1. भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?
जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और भूजल का गिरता स्तर सबसे बड़े खतरे हैं।

2. 'जलवायु-अनुकूल' खाद्य प्रणाली का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ एक ऐसी प्रणाली से है जो बदलती जलवायु परिस्थितियों के बावजूद निरंतर उत्पादन, सुरक्षित भंडारण और निर्बाध वितरण सुनिश्चित कर सके।