सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें 700 गवाहों वाले UAPA मामले को जल्द पूरा करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने न्यायाधीशों पर बढ़ते बोझ और अदालती बुनियादी ढांचे की कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने 700 गवाहों वाले UAPA मामले में कर्नाटक सरकार की योजना को 'अवास्तविक' बताया।
- कोर्ट ने पाया कि एक जज पहले से ही 90 से अधिक UAPA मामलों को संभाल रहा है।
- मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि एक विशेष अदालत के पास केवल 12-15 UAPA मामले होने चाहिए।
- शाहिद खान की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने गवाहों के परीक्षण के लिए समय सीमा तय की।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कर्नाटक सरकार के उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें 700 से अधिक गवाहों वाले एक UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) मामले में मुकदमे को 'उचित समय' के भीतर पूरा करने का दावा किया गया था। न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की अध्यक्षता वाले तीन न्यायाधीशों के पीठ ने इस योजना को 'परियों की कहानी' (fairy tale) के समान अव्यावहारिक बताया।
यह टिप्पणी शाहिद खान की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जो 2022 से हिरासत में है। अभियोजन पक्ष का तर्क था कि वे मामले को तेजी से निपटा सकते हैं, लेकिन अदालत ने तर्क दिया कि 707 गवाहों, जिनमें 64 संरक्षित गवाह भी शामिल हैं, का परीक्षण करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला भारत की न्यायिक प्रणाली में लंबित मामलों के भारी बोझ और विशेष कानूनों (जैसे UAPA) के तहत त्वरित न्याय की चुनौतियों को उजागर करता है। जब एक ही न्यायाधीश पर 90 से अधिक जटिल मामले होते हैं, तो न्याय की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
"न्यायाधीशों पर काम का बोझ मानवीय सीमाओं से परे है; विशेष अदालतों को केवल 12 से 15 UAPA मामलों तक ही सीमित होना चाहिए।" - सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत ने राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को विशेष अदालतों के बोझ को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि यदि मामलों की संख्या अधिक है, तो राज्य को अतिरिक्त अदालतों और बुनियादी ढांचे का निर्माण करना चाहिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
UAPA भारत का एक कड़ा आतंकवाद-विरोधी कानून है। इसके तहत आरोपियों को लंबे समय तक बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति है, जिससे अक्सर न्यायिक देरी और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की योजना को 'परियों की कहानी' क्यों कहा?
क्योंकि 700 से अधिक गवाहों का परीक्षण एक सीमित समय में करना व्यावहारिक रूप से असंभव और अव्यावहारिक लगता है।
2. अदालत ने न्यायाधीशों के बोझ के बारे में क्या कहा?
अदालत ने कहा कि एक न्यायाधीश को 90 के बजाय केवल 12-15 UAPA मामले संभालने चाहिए ताकि न्याय सुचारू रूप से हो सके।