पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एडवोकेट प्रविंद्र चौहान की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति को रोकने वाली जनहित याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने इसे व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित बताया और याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया है।

मुख्य बिंदु

  • अदालत ने प्रविंद्र चौहान की न्यायाधीश नियुक्ति के खिलाफ दायर PIL को खारिज किया।
  • याचिकाकर्ता पर ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया गया जो PGIMER के कल्याण कोष में जाएगा।
  • कोर्ट ने याचिका को 'व्यक्तिगत प्रतिशोध' और 'प्रक्रिया का दुरुपयोग' करार दिया।
  • उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम की चयन प्रक्रिया को अदालत ने निष्पक्ष माना।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एडवोकेट प्रविंद्र चौहान को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की कोलेजियम सिफारिश को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह याचिका जनहित के बजाय व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित थी।

याचिकाकर्ता प्रदीप सिंह ने केंद्र सरकार से कोलेजियम की सिफारिशों को रोकने और चौहान को शपथ लेने से रोकने की मांग की थी। हालांकि, प्रतिवादी पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद, अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता का उद्देश्य केवल निजी रंजिश निकालना था। अदालत ने याचिकाकर्ता पर ₹1,00,000 का भारी जुर्माना लगाया है, जिसे चंडीगढ़ स्थित PGIMER के 'पुअर पेशेंट वेलफेयर फंड' में जमा करना होगा।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला न्यायिक नियुक्तियों की पवित्रता और जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश करता है। कोलेजियम प्रणाली के माध्यम से होने वाली नियुक्तियां कई स्तरों पर जांच के बाद ही अंतिम रूप लेती हैं, जिसमें राज्य सरकार, कानून मंत्रालय और सर्वोच्च न्यायालय शामिल हैं।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोलेजियम की सिफारिशों को किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा चुनौती नहीं दी जा सकती जिसका व्यक्तिगत कोई मुद्दा हो।

अदालत ने बलवंत सिंह चौफाल दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि अदालतों को उन याचिकाओं की जांच करनी चाहिए जो दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से दायर की जाती हैं। यह पाया गया कि याचिकाकर्ता पहले भी चौहान के खिलाफ याचिका दायर कर चुका है, जो उनके बीच के पुराने विवाद को दर्शाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्रविंद्र चौहान इससे पहले हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (HERC) में न्यायिक सदस्य के रूप में कार्यरत थे। याचिकाकर्ता का दावा था कि चौहान की उपस्थिति के दौरान ही उसे सेवा से बर्खास्त किया गया था, जो इस पूरे मामले के पीछे के व्यक्तिगत संघर्ष को स्पष्ट करता है।

क्या आप जानते हैं?: कोलेजियम प्रणाली भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उपयोग की जाने वाली एक प्रणाली है, जिसमें न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अदालत ने जुर्माना क्यों लगाया?
अदालत ने याचिका को प्रक्रिया का दुरुपयोग और व्यक्तिगत रंजिश निकालने का जरिया माना, इसलिए जुर्माना लगाया गया।

2. जुर्माना कहाँ जमा किया जाएगा?
जुर्माने की राशि चंडीगढ़ के PGIMER के गरीब रोगी कल्याण कोष में जमा की जाएगी।