गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एम.के. यादव के सेवानिवृत्ति के बाद विशेष मुख्य सचिव के रूप में तीसरे कार्यकाल विस्तार को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर असम सरकार को नोटिस जारी किया है।
- पूर्व PCCF एम.के. यादव के सेवानिवृत्ति के बाद विशेष मुख्य सचिव के रूप में कार्यकाल विस्तार को कोर्ट में चुनौती दी गई है।
- याचिकाकर्ता का आरोप है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने यादव के कार्यकाल के दौरान वन भूमि के दुरुपयोग में गंभीर खामियां पाई थीं।
- गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने इस मामले में असम सरकार से 15 अक्टूबर तक जवाब मांगा है।
गुवाहाटी: गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम सरकार को एक महत्वपूर्ण नोटिस जारी किया है, जिसमें पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) के सेवानिवृत्ति के बाद उनके तीसरे कार्यकाल विस्तार की वैधता को चुनौती दी गई है। मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने शुक्रवार को इस मामले पर संज्ञान लेते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।
यह मामला पूर्व भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी एम.के. यादव से जुड़ा है, जो फरवरी 2024 में सेवानिवृत्त हुए थे। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद 'विशेष मुख्य सचिव (वन)' के रूप में पूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों के साथ नियुक्त करना नियमों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता, पूर्वी असम के संरक्षणवादी रोहित चौधरी, का तर्क है कि यह नियुक्ति 2018 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) का उल्लंघन करती है, जो केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही सेवानिवृत्त अधिकारियों की संविदात्मक नियुक्ति की अनुमति देता है।
क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वन संरक्षण कानूनों की पवित्रता से जुड़ा है। याचिका में दावा किया गया है कि एम.के. यादव के कार्यकाल के दौरान, केंद्र सरकार की अनुमति के बिना वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए डायवर्ट किया गया था। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस दौरान गंभीर खामियां पाई थीं और राज्य सरकार को वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 3A और 3B के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।
यह मामला स्पष्ट करता है कि सेवानिवृत्ति के बाद अधिकारियों को दी जाने वाली अत्यधिक शक्तियां प्रशासनिक जवाबदेही और पारिस्थितिक सुरक्षा के बीच संघर्ष पैदा कर सकती हैं।
याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि किसी भी पुनर्नियुक्ति या विस्तार के लिए संतोषजनक प्रदर्शन का मूल्यांकन अनिवार्य है। अदालत ने अब सरकार से यह बताने को कहा है कि क्या यादव के पिछले कार्यकाल की खामियों के बावजूद उन्हें इतनी उच्च शक्ति वाला पद दिया जाना उचित था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में वन संरक्षण के लिए वन संरक्षण अधिनियम 1980 एक आधारशिला है। यह अधिनियम बिना केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग पर कड़ा नियंत्रण रखता है। असम जैसे जैव विविधता से समृद्ध राज्यों में, वन भूमि का प्रबंधन और अधिकारियों की जवाबदेही हमेशा से ही एक संवेदनशील मुद्दा रही है।
Frequently Asked Questions
1. एम.के. यादव के खिलाफ मुख्य आरोप क्या हैं?
उन पर केंद्र की अनुमति के बिना वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए डायवर्ट करने और अपने कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक खामियां छोड़ने का आरोप है।
2. न्यायालय ने सरकार को क्या निर्देश दिया है?
न्यायालय ने असम सरकार को इस याचिका पर अपना विस्तृत जवाब 15 अक्टूबर तक प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।