गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी एम के यादव की तीसरे कार्यकाल के विस्तार को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर असम सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में नियमों के उल्लंघन और वन भूमि के गलत उपयोग के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

  • गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एम के यादव की पुनर्नियुक्ति पर असम सरकार से जवाब मांगा है।
  • याचिका में सेवानिवृत्ति के बाद नियमों में बदलाव कर विशेष नियुक्तियों का आरोप लगाया गया है।
  • पूर्व अधिकारी पर वन भूमि पर अवैध निर्माण के गंभीर आरोप हैं।

गुवाहाटी, असम: गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए असम सरकार को नोटिस जारी किया है। यह याचिका सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी एम के यादव की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देती है, जिन्हें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का करीबी माना जाता है।

न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने 11 सितंबर को असम सरकार से इस मामले में प्रतिक्रिया मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि और नियम परिवर्तन

पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित चौधरी द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि असम सरकार ने 2024 में अपने कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) में महत्वपूर्ण संशोधन किया। याचिका के अनुसार, 2018 के नियमों के तहत सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्तियां केवल 'दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों' में की जा सकती थीं, लेकिन नए संशोधनों ने मुख्यमंत्री की पूर्व अनुमति मिलने पर राज्य की समिति की जांच की आवश्यकता को समाप्त कर दिया।

एम के यादव, जो फरवरी 2024 में सेवानिवृत्त हुए थे, उन्हें अब तक तीन बार अनुबंध पर विस्तार दिया जा चुका है। उनका वर्तमान कार्यकाल 12 नवंबर को समाप्त हो रहा है।

क्यों यह मामला महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति का नहीं है, बल्कि यह वन संरक्षण कानूनों और सरकारी पारदर्शिता के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। यदि अदालत इन आरोपों को सही पाती है, तो यह राज्य में सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्तियों के पूरे ढांचे को बदल सकता है।

यह मामला स्थापित करता है कि क्या प्रशासनिक नियुक्तियां व्यक्तिगत संबंधों से प्रेरित हैं या वे वास्तव में सार्वजनिक हित और कानूनी अनिवार्यताओं के अनुरूप हैं।

वन भूमि के उल्लंघन के आरोप

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पूर्व में यादव के विरुद्ध 'घोर उल्लंघन' के आरोप लगाए थे। आरोप है कि उन्होंने अपनी तत्कालीन भूमिका में गेलेकी (सिवसगुड़ी) और दामचेरा (हैलाकांडी) के वन क्षेत्रों में कमांडो बटालियन कैंप स्थापित करने की अनुमति दी थी, जो लगभग 37 हेक्टेयर वन भूमि पर फैला हुआ था।

दिलचस्प बात यह है कि जब पर्यावरण मंत्रालय ने इन निर्माणों को रोकने का निर्देश दिया था, तब मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए इन कैंपों के 'पोस्ट फैक्टो' (कार्य पश्चात) अनुमोदन की मांग की थी, जिसे केंद्र द्वारा स्वीकार कर लिया गया था।

Did You Know?: भारत में वन संरक्षण अधिनियम के तहत वन भूमि का उपयोग गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए करने हेतु केंद्र सरकार की सख्त अनुमति अनिवार्य है।

Frequently Asked Questions

1. एम के यादव पर मुख्य आरोप क्या हैं?
उन पर वन भूमि पर अवैध रूप से पुलिस कमांडो कैंपों की अनुमति देने और सेवानिवृत्ति के बाद नियमों में बदलाव का लाभ उठाने का आरोप है।

2. अदालत ने असम सरकार से क्या मांगा है?
अदालत ने यादव की पुनर्नियुक्ति के आधार और नियमों में किए गए बदलावों पर सरकार का आधिकारिक पक्ष मांगा है।