सुप्रीम कोर्ट ने प्रशिक्षण के दौरान विकलांग हुए सैन्य कैडेटों को आरक्षण और लाभ देने की संभावना पर विचार करने की बात कही है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा है कि यदि उन्हें 'पूर्व सैनिक' नहीं कहा जा सकता, तो उन्हें अन्य किस श्रेणी में लाभ दिया जा सकता है।

मुख्य बिंदु

  • सुप्रीम कोर्ट प्रशिक्षण के दौरान विकलांग हुए कैडेटों के भविष्य पर विचार कर रहा है।
  • अदालत ने 'पूर्व सैनिक' टैग के बिना भी अन्य लाभ प्रदान करने का विकल्प तलाशा है।
  • केंद्र सरकार ने 'पूर्व सैनिक' शब्दावली के उपयोग में तकनीकी कठिनाइयों का हवाला दिया है।
  • मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान यह विचार करने की बात कही है कि प्रशिक्षण के दौरान विकलांगता का शिकार हुए सैन्य अधिकारी कैडेटों को क्या लाभ दिए जा सकते हैं। यह मामला उन कैडेटों से जुड़ा है जिन्हें सैन्य सेवा से 'बोर्ड आउट' (सेवामुक्त) कर दिया गया है।

न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब केंद्र सरकार ने इन कैडेटों को 'पूर्व सैनिक' (Ex-servicemen) का दर्जा देने में आने वाली तकनीकी समस्याओं का उल्लेख किया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्ट रूप से कहा, "बिना 'पूर्व सैनिक' शब्द का उपयोग किए, आपको क्या लाभ मिल सकते हैं, हम देखेंगेों"।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि उन युवाओं के मानवीय पक्ष का है जिन्होंने देश की सेवा के लिए अपना शरीर समर्पित कर दिया। प्रशिक्षण के दौरान चोटिल होने वाले ये कैडेट साधारण छात्र नहीं होते, बल्कि उच्च महत्वाकांक्षा वाले सैनिक होते हैं। उनकी विकलांगता के कारण उनके जीवन में आने वाला अचानक बदलाव और भविष्य की अनिश्चितता एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है।

"इन कैडेटों की निराशा का स्तर बहुत अधिक है क्योंकि उनकी अपेक्षाएं भी बहुत ऊंची थीं।" - न्यायमूर्ति नागरत्ना

अदालत ने सरकार से सबरवाल समिति की सिफारिशों पर पुनर्विचार करने को भी कहा है। जुलाई 2015 की इस समिति ने विकलांग कैडेटों को पूर्व सैनिकों के रूप में मानने और उन्हें विकलांगता पेंशन देने की सिफारिश की थी। कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि उन्हें 'पूर्व सैनिक' नहीं माना जा सकता, तो उन्हें 'पूर्व सैन्य कर्मी' (Ex-military personnel) की श्रेणी में लाकर आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह मामला तब सुर्खियों में आया जब 11 अगस्त को एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि लगभग 500 अधिकारी कैडेटों को 1985 से अब तक राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) जैसे शीर्ष संस्थानों से चिकित्सा आधार पर सेवामुक्त किया गया है। ये कैडेट भारी चिकित्सा बिलों और सीमित सरकारी लाभों के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

क्या आप जानते हैं?: सबरवाल समिति ने 2015 में ही इन कैडेटों के लिए विशेष पेंशन और आरक्षण की वकालत की थी, लेकिन कार्यान्वयन में देरी हुई।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'बोर्ड आउट' कैडेट कौन होते हैं?
ये वे कैडेट होते हैं जिन्हें प्रशिक्षण के दौरान लगी शारीरिक अक्षमता या चोट के कारण सैन्य सेवा जारी रखने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।

2. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को क्या निर्देश दिया है?
कोर्ट ने सरकार से कैडेटों की स्थिति सुधारने के लिए सबरवाल समिति की सिफारिशों पर फिर से विचार करने को कहा है।