दिल्ली उच्च न्यायालय ने संसद की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की मांग करने वाली एक जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सुरक्षा मामले कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

मुख्य बातें

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने संसद की सुरक्षा समीक्षा की मांग वाली PIL खारिज की।
  • कोर्ट ने कहा कि संसद की सुरक्षा और संचालन कार्यपालिका का मामला है।
  • याचिका में 2001 के हमले और 2023 की सुरक्षा चूक का हवाला दिया गया था।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए संसद की सुरक्षा और सुरक्षा तंत्र की समीक्षा की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को सुनने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि संसद के प्रशासनिक या परिचालन संबंधी मामलों पर निर्देश जारी करना अदालत का कार्य नहीं है।

सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से तीखे सवाल पूछे। अदालत ने टिप्पणी की, "क्या आप सोचते हैं कि इस देश की संसद अपनी सुरक्षा करने में असमर्थ है? हम संसद को यह निर्देश देने के लिए नहीं हैं कि उनके प्रशासनिक और परिचालन तंत्र को कैसे कार्य करना चाहिए?" कोर्ट का मानना है कि संसद की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र के भीतर आती है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत को मजबूत करता है। संसद, जो देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, की सुरक्षा प्रोटोकॉल का निर्णय लेना पूरी तरह से विधायी और कार्यकारी निकायों का उत्तरदायित्व है। न्यायालय का हस्तक्षेप इस मामले में संस्थागत स्वायत्तता के विरुद्ध माना जा सकता है।

संसद की सुरक्षा का प्रबंधन करना एक संप्रभु कार्य है, जिसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन हो सकता है।

याचिकाकर्ता राज सिंह ने 2001 के आतंकवादी हमले और 2023 में हुई सुरक्षा चूक का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि मौजूदा सुरक्षा ढांचे की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है। याचिका में यह भी कहा गया था कि 'संसद चलो' जैसे आंदोलनों के बढ़ते चलन के कारण सुरक्षा चुनौतियों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संसद की सुरक्षा का मुद्दा भारत में अत्यंत संवेदनशील रहा है। 13 दिसंबर, 2001 को संसद भवन पर हुआ हमला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय था। इसके बाद से सुरक्षा व्यवस्था में कई बदलाव किए गए, लेकिन 2023 में हुई सुरक्षा चूक ने एक बार फिर सुरक्षा प्रोटोकॉल पर बहस छेड़ दी है।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय संसद की सुरक्षा की जिम्मेदारी मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की होती है, जो गृह मंत्रालय के समन्वय में काम करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अदालत ने याचिका क्यों खारिज की?
अदालत ने कहा कि संसद की सुरक्षा और संचालन के मामले कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि न्यायपालिका के।

2. याचिकाकर्ता ने क्या मांग की थी?
याचिकाकर्ता ने संसद की सुरक्षा, तकनीकी और साइबर-सुरक्षा तंत्र की व्यापक समीक्षा की मांग की थी।