केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग के साथ प्रेम संबंधों के मामलों में भी 'सहमति' कानूनी रूप से अप्रासंगिक है। अदालत ने POCSO अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया है।

  • नाबालिग के साथ 'सहमति' से यौन अपराध का मामला खत्म नहीं होता।
  • केरल उच्च न्यायालय ने POCSO अधिनियम के तहत सजा को बरकरार रखा।
  • अदालत ने कहा कि पीड़ित का बयान 'स्टर्लिंग क्वालिटी' का और विश्वसनीय है।

केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए मंगलवार को स्पष्ट किया कि यदि मामला किसी नाबालिग के साथ यौन शोषण का है, तो 'सहमति' का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता। न्यायालय ने यह रुख एक ऐसे आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए अपनाया, जिसने POCSO अधिनियम, 2012 के तहत अपनी सजा को चुनौती दी थी।

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि नाबालिग द्वारा दिया गया साक्ष्य अत्यंत विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता का था। अदालत ने आरोपी के उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि उसे झूठा फंसाया गया है। इससे पहले, अलाप्पुझा की विशेष अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार और POCSO अधिनियम के तहत यौन शोषण का दोषी पाते हुए 10 साल के कारावास और ₹50,000 के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय भारत में बाल यौन शोषण से संबंधित कानूनी ढांचे को और अधिक मजबूत करता है। अक्सर बचाव पक्ष 'प्रेम संबंध' या 'सहमति' का तर्क देकर नाबालिगों के शोषण को वैध बनाने की कोशिश करता है, लेकिन यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में नाबालिग की सहमति का कोई अस्तित्व नहीं है।

नाबालिगों की सुरक्षा के मामले में 'सहमति' का तर्क कानून की मूल भावना के विरुद्ध है।

आरोपी ने तर्क दिया था कि उसका नाबालिग के साथ रोमांटिक रिश्ता था और यह मामला केवल प्रतिशोध की भावना से दर्ज किया गया है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन तर्कों को आधारहीन माना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सजा में किसी भी प्रकार की कमी नहीं की जा सकती क्योंकि निचली अदालत पहले ही न्यूनतम संभव सजा दे चुकी थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

POCSO अधिनियम, 2012 को विशेष रूप से बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया था। यह कानून मानता है कि एक नाबालिग में सहमति देने की कानूनी और मानसिक क्षमता नहीं होती है, इसलिए किसी भी प्रकार का यौन संपर्क, चाहे वह आपसी सहमति से ही क्यों न हो, कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में आता है।

Did You Know?: POCSO अधिनियम के तहत, अपराध की गंभीरता के आधार पर सजा को और अधिक सख्त बनाया गया है ताकि बच्चों को न्याय मिल सके।

Frequently Asked Questions

1. क्या नाबालिग की सहमति कानूनी रूप से मान्य है?
नहीं, POCSO कानून के तहत नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है।

2. केरल उच्च न्यायालय ने इस मामले में क्या कहा?
न्यायालय ने कहा कि प्रेम संबंधों के आधार पर यौन शोषण के मामलों में सजा को कम नहीं किया जा सकता।