दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम के एक दशक बाद भी, केरल में दिव्यांग बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य और सामाजिक उपेक्षा को लेकर गहरे संकट में हैं।

  • दिव्यांगता अधिकार अधिनियम के 10 साल बाद भी माता-पिता को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • माता-पिता के मानसिक स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं।
  • सामाजिक कलंक और आर्थिक असुरक्षा के कारण कई माता-पिता आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर हैं।

केरल में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम (RPwD Act) पारित हुए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अभी भी हृदयविदारक है। कोझिकोड की रानी महेश जैसी कई माताएं उस मानसिक द्वंद्व से जूझ रही हैं, जहां उन्हें अपने पति के इलाज और अपने दिव्यांग बच्चे की देखभाल के बीच चुनाव करना पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दिव्यांग बच्चों के माता-पिता पांच चरणों के मानसिक संघर्ष से गुजरते हैं: वास्तविकता से इनकार, क्रोध, पलायन की इच्छा, अवसाद और अंत में वास्तविकता की स्वीकृति। कोझिकोड स्थित कम्पोजिट रीजनल सेंटर (CRC) के निदेशक के. एन. रोशन बिजली बताते हैं कि यह संघर्ष केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। कई मामलों में तो पुरुष अपनी पत्नियों को बच्चे की स्थिति के लिए दोषी ठहराकर उन्हें छोड़ देते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक पारिवारिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और नीतिगत विफलता है। जब समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को बुनियादी सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता, तो यह देश के समावेशी विकास के दावों पर सवाल उठाता है।

समाज को इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि अधिकांश दिव्यांग व्यक्ति अपने माता-पिता की सहायता के बिना जीवित नहीं रह सकते।

सबसे भयावह पहलू बच्चों के वयस्क होने पर सामने आता है। पिछले एक वर्ष में केरल में ऐसे 20 से अधिक मामले सामने आए हैं जहां माता-पिता ने या तो अपने वयस्क दिव्यांग बच्चों को मारने की कोशिश की या स्वयं आत्महत्या का प्रयास किया। उनका सबसे बड़ा डर है: 'मेरे बाद मेरे बच्चे का क्या होगा?'

सामाजिक स्तर पर भी भेदभाव कम नहीं हुआ है। शादियों और अन्य सामाजिक आयोजनों से दिव्यांग बच्चों को दूर रखा जाता है, जिससे माता-पिता को सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है। एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, कई उच्च शिक्षित माता-पिता (जिनमें पीएचडी और आईआईटी स्नातक शामिल हैं) भी अपने बच्चों की देखभाल के कारण अपने करियर को पूरी तरह छोड़ चुके हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करना था। हालांकि, कानून के बावजूद, बुनियादी ढांचे, वित्तीय सहायता और सामाजिक जागरूकता की कमी आज भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

Did You Know?: दिव्यांगता के कारण कई माता-पिता 'जादुई उपचार' के झांसे में आकर अपनी संपत्ति तक बेच देते हैं, जो अंततः उनके बच्चों के लिए और भी घातक साबित होता है।

Frequently Asked Questions

1. दिव्यांग बच्चों के माता-पिता के लिए प्रमुख चिंताएं क्या हैं?
मुख्य चिंताओं में बच्चों की भविष्य की सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता, सामाजिक कलंक और स्वयं का मानसिक स्वास्थ्य शामिल है।

2. क्या सरकार की कोई योजनाएं उपलब्ध हैं?
हाँ, केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाएं हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इनका लाभ सही लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा है।